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बंगा विधी दुर्गाबाड़ी सोसाइट द्वारा पांच दिवसीय दुर्गा पूजा महोत्सव का शुभारंभ

बंगा विधी दुर्गाबाड़ी सोसाइट द्वारा पांच दिवसीय दुर्गा पूजा महोत्सव का शुभारंभ

देहरादून , दुर्गापूजा आज विश्व प्रसिद्ध है। आज भव्य मंडप, चकाचौंध कर देने वाली रोशनी के बीच चमचमाती मां दुर्गा की प्रतिमा होती है लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह भव्य दुर्गापूजा कब शुरू हई ? किसने पहली बार दुर्गापूजा की थी? आखिर दुर्गापूजा करने का कारण क्या था? सनातन धर्मानुसार इतने देवताओं के होने के बाद 10 भुजा वाली मां दुर्गा की पूजा ही क्यों? ऐसे कई सवाल लोगों के मन में उठते हैं तो आईए बतातें हैं

पुरोहितों ने बताया कि कलियुग में शक्ति की देवी महिषासुरमर्दिनी मां दुर्गा की पूजा करें। मां दुर्गा सभी को सुख समृद्धि, ज्ञान और शाक्ति सब प्रदान करती हैं। इसी लिये धूमधाम से मां दुर्गा की पूजा की।

देवी भागवतपुराण और दुर्गा सप्तशती में मिलती है।दुर्गा सप्तशती और देवी भागवतपुराण में शरद ऋतु में होने वाली दुर्गापूजा का वर्णन है। देवी भागवतपुराण में इसका भी उल्लेख है कि भगवान राम ने लंका जाने से पहले शक्ति के लिए देवी मां दुर्गा की पूजा की थी। देवी भागवत पुराण की रचना की तिथि पर विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वानों का मानना है

पारंपरिक दुर्गापूजा चार अलग अलग विधियों में होती है। विद्वानों की माने तो पहली विधि कालिकापुराण की विधि के अनुसार है। दूसरी विधि वृहतनंदीकेश्वर विधि के अनुसार है। तीसरी विधि देवीपुराण के अनुसार और चौथी व आखिरी विधि मत्स्य पुराण के अनुसार है। इन्हीं चार विधियों में होती है। फिलहाल पूजा की मूल विधियां समान है पर अब थोड़ा बहुत अंतर है।

भाद्र कृष्णपक्ष की नवमी को ही शुरू होती है पूजा पंडाल लाला कलुमल धर्मशाला राजा रोड देहरादून
बंगाल की सदियों पुरानी पारंपरिक दुर्गापूजा भाद्र मास के कृष्णपक्ष की नवमी को ही शुरूहो जाती है। इसी दिन से शुरू हो जाती है। इसके बाद षष्ठी के दिन मां दुर्गा का बोधन होता है। इसमें मां दुर्गा का आह्वान किया जाता है और बेल के पेड़ की पूजा की जाती है। सप्तमी के दिन नवपत्रिका पूजा होती है। इस नवपत्रिका पूजा में धान, मान अरवी, अरवी, हल्दी का पेड़, जयंती, अशोक, अनार की डाली और बेल की डाली को केले के पेड़ के साथ बांधकर पूजा की जा जाती है। उसके बाद गंगा में स्नान करवाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि नवपत्रिका पूजा मां दुर्गा के नौ रूपों की प्रकृति की शक्ति स्वरूपा पूजा है। उसके बाद अष्टमी नवमी की संध्या को संधि पूजा होती है। दशमी के दिन पारंपरिक रूप में माता दुर्गा का विसर्जन होता है।इस मौके पर कार्यक्रम में मेघनाथ मंडल,गणेश बेरा,निर्मल मंडल,तुहिन हलदर, शुभंकर मन्ना,सुजान घोष उपलब्ध थे

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