देवभूमि उत्तराखंड के जनपद चमोली में लंगासू के पास, बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग 58 से मात्र 500 की दूरी पर अलकनंदा के दाहिनी तट पर स्थित है शिव और शक्ति का अद्भुत एवं अलौकिक मंदिर। आद्यात्मिक ऊर्जा एवं धार्मिक सद्भाव का केंद्र बिंदु है जिलासू स्थित यह दिव्य स्थल।
जिलासू के शिव मंदिर की कला कौशलता, शिलालेख, मूर्तियां जैसे- गणेश जी, पार्वती जी, गरुड़ जी, कुबेर जी, नंदीबैल, विशालकाय नगाड़ा तथा विशालकाय शिलाओं से निर्मित मंदिर इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि यह मंदिर शंकराचार्य युग मे निर्मित किया गया है।
इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग स्फटिक का है। इस लिंग की अपनी विशेषता है कि यह ऊंचाई में कम और चौड़ाई में अधिक है। शिवलिंग को गंगाजल से स्थानीय श्रद्धालुओं द्वारा तब भरा जाता है जब क्षेत्र में लंबे समय तक वर्षा नही होती है व फसलों और मवेशियों के जीवन को संकट पैदा हो जाता है। शिवलिंग के जलमग्न होते ही महासूखे काल में भी सावन की घटा बरस पड़ती है।
जिलासू शिव मंदिर के पास ही माँ चंडिका देवी का मंदिर है। पहले यह मंदिर के आकार में न् होकर एक साधारण सी पत्थरों से ढकी लघु मकान की आकृति थी। परंतु 1977 की बन्याथ के शेष धन से दो कमरों सहित सीमेंट निर्मित मंदिर का निर्माण किया गया।
एक मान्यता के अनुसार पहले माँ चंडिका नागपुर पट्टी के ग्राम कुमेड़ा में निवास करती थी। एक दिन ग्राम सरमोला निवासी स्वo श्री धर्म सिंह के सपने में माँ चंडिका आयी और उनसे कहा कि मैं एक निश्चित स्थान पर सांप के रूप में रहूंगी तुम मेरे ऊपर एक कपड़ा फेंकना और एक टोकरी में रखकर जिलासू स्थित शिवालय के नजदीक रख देना। स्वo धर्मसिंह ने ऐसा ही किया। जिलासू जाते वक्त सिवाई के बनातौली में टोकरी नीचे रखकर उन्होंने विश्राम किया, इसलिए यह स्थान भी माता का पूजास्थल बन गया। बाद में उन्होंने सर्प के रूप में चंडिका को जिलासू में रख दिया। तब से शिव और शक्ति की संयुक्त पूजा की जाती है इस स्थान पर।
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