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शूलिनी शोधकर्ता ने प्रमाणित किए हिमालयी पौधों के औषधीय गुण—अस्थमा, बुखार, पीलिया व संक्रमण में उपयोगी

By: Naveen Joshi

On: Friday, August 29, 2025 5:59 PM

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देहरादून-  हिमालयी औषधीय पौधे, जिन्हें पीढ़ियों से आदिवासी समुदाय पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग करते आए हैं, अब वैज्ञानिक रूप से उनके स्वास्थ्य लाभों के लिए प्रमाणित किए जा रहे हैं। इन पौधों के औषधीय महत्व को अस्थमा, बुखार, पीलिया, शारीरिक दर्द, श्वसन संबंधी समस्याओं और संक्रमण जैसी स्थितियों के प्रबंधन में कारगर पाया गया है। शूलिनी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज की सहायक प्रोफेसर एवं हर्बेरियम व ड्रग म्यूज़ियम की प्रभारी डॉ. राधा के व्यापक शोध से पता चला है कि इनमें से कई पौधे एंटीऑक्सीडेंट, एंटीमाइक्रोबियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-डायबिटिक, एंटी-कैंसर और यकृत संरक्षण (हेपाटोप्रोटेक्टिव) गुणों से भरपूर हैं। वर्ष 2025 में उन्होंने चार पेटेंट दर्ज कराए हैं, जो पारंपरिक ज्ञान को फंक्शनल फूड्स और प्राकृतिक एंटीमाइक्रोबियल उत्पादों में बदलने की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम है।

 

 

अध्ययन किए गए पौधों में सेमलके फूल विशेष रूप से आशाजनक पाए गए हैं। पारंपरिक रूप से इनके शीतल और पुनर्स्थापनात्मक गुणों को महत्व दिया जाता रहा है। वैज्ञानिक परीक्षणों में यह फूल आहार फाइबर, फिनॉल्स और फ्लेवोनॉयड्स से भरपूर पाया गया है, जो एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गतिविधियों में सहायक हैं तथा पोषण की कमी को दूर करने में मददगार हैं। इसी आधार पर डॉ. राधा ने सेमल के फूल और सेब से बना पोषक तत्वों से युक्त जैम तथा एक रेडी-टू-सर्व ड्रिंक तैयार की है, जिसमें सभी सक्रिय यौगिक (बायोएक्टिव कम्पाउंड्स) सुरक्षित रहते हैं। इन दोनों उत्पादों में कृत्रिम संरक्षक या रंग का प्रयोग नहीं किया गया है। वैज्ञानिक समीक्षाओं ने इस फूल में एंटी-डायबिटिक, एंटी-कैंसर, एंटीमाइक्रोबियल और यकृत-संरक्षण की क्षमता को भी रेखांकित किया है।

 

 

प्रयोगशाला अध्ययनों में दो अन्य हिमालयी पौधों ने भी मजबूत एंटीमाइक्रोबियल गतिविधि दिखाई। प्रिंसेपिया यूटिलिस (हिमालयी चेरी), जिसका भारतीय और चीनी पारंपरिक चिकित्सा में लंबे समय से उपयोग होता रहा है, फिनोलिक एसिड, फ्लेवोनॉयड्स और ट्राइटरपेनॉयड्स से भरपूर पाया गया। परीक्षणों में इस पौधे के अर्क ने क्लेब्सिएला न्यूमोनिया और स्ट्रेप्टोकोकस पायोजीनस जैसे जीवाणुओं को, जिनमें प्रतिरोधी स्ट्रेन भी शामिल थे, रोकने की क्षमता दिखाई—यह इस पौधे की एंटीमाइक्रोबियल क्षमता का पहला वैज्ञानिक प्रमाण है। इसी प्रकार, गिलोय, जिसका आयुर्वेद में प्रतिरक्षा बढ़ाने के लिए व्यापक उपयोग होता है, को पर्यावरण-अनुकूल अल्ट्रासोनिक पद्धति से प्रसंस्कृत किया गया, जिसमें 13 सक्रिय एंटीमाइक्रोबियल यौगिक सुरक्षित रहे। इसके अर्क ने बहु-दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया पर प्रभावी कार्य किया, जिससे इसके प्राकृतिक एंटीमाइक्रोबियल एजेंट के रूप में महत्व की पुष्टि हुई।

 

 

 

डॉ. राधा ने कहा, “हिमालय की जनजातियाँ पारिस्थितिक ज्ञान का जीवित भंडार हैं। अस्थमा, पीलिया, बुखार और संक्रमण के लिए उनकी कई पारंपरिक औषधियाँ अब प्रयोगशाला में औषधीय क्षमता के साथ प्रमाणित हो चुकी हैं। हमारा लक्ष्य इस पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक साक्ष्यों से जोड़ना है ताकि यह निवारक स्वास्थ्य देखभाल में योगदान दे सके और जैव-विविधता की रक्षा भी सुनिश्चित हो।”

 

 

इन खोजों से आगे बढ़ते हुए, डॉ. राधा के एथ्नोबॉटनिकल सर्वेक्षण में 1,600 से अधिक हिमालयी पौधों का दस्तावेजीकरण किया गया है, जिनमें से कई का फाइटोकेमिकल और औषधीय विश्लेषण किया गया। उनकी महत्वपूर्ण शोध कृति “ए सर्वे ऑन एथ्नोवेटरिनरी मेडिसिन्स यूज्ड बाय द ट्राइबल माइग्रेटरी

 

 

 

शेफर्ड्स ऑफ नॉर्थवेस्टर्न हिमालय” इस क्षेत्र की पहली ऐसी विस्तृत रिपोर्ट है, जिसमें प्रवासी गद्दी-बकरवाल चरवाहों द्वारा पशुधन रोगों के उपचार हेतु प्रयुक्त 181 पौधों का विवरण दर्ज किया गया।

 

 

हालांकि, जड़ों और छाल की अस्थिर कटाई से कई स्थानिक और संकटग्रस्त हिमालयी पौधों—जैसे कुटकी (Picrorhiza kurroa), भारतीय जेंटियन (Gentiana kurroo), श्वेत हिमालयी कुमुदिनी (Lilium polyphyllum) और हिमालयी जंगली जौ (Elymus himalayanus)—के अस्तित्व पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। इस कारण पारंपरिक ज्ञान का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और संरक्षण अब पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

 

 

यह शोध कार्य एडवांस्ड नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) के सहयोग से किया गया है तथा बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया (देहरादून), डॉ. वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री (नौनी), शूलिनी विश्वविद्यालय का स्कूल ऑफ फार्मास्यूटिकल साइंसेज और अंतरराष्ट्रीय सहयोगी विश्वविद्यालयों—स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, ईस्ट कैरोलिना यूनिवर्सिटी, क्लेमसन यूनिवर्सिटी, टेक्सास टेक यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ वीगो (स्पेन)—के साथ मिलकर संचालित है।

 

 

हिमालयी पौधों के औषधीय गुणों को रेखांकित कर और उन्हें पेटेंट दाखिलियों से प्रमाणित करके डॉ. राधा का कार्य यह दर्शाता है कि किस प्रकार पारंपरिक औषधियाँ आधुनिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए प्रमाण-आधारित नवाचारों को जन्म दे सकती हैं, साथ ही जैव-विविधता संरक्षण की तात्कालिक आवश्यकता पर भी बल देती हैं।

 

 

 

 

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