हरिद्वार। हरिद्वार में प्रवाहित रामकथा के चौथे दिन बापू ने सत्य, प्रेम और करुणा को जीवन का वास्तविक आधार बताते हुए कहा कि मनुष्य की यात्रा मृत्यु से अमृत की ओर है। कथा के दौरान उन्होंने कहा कि पहली वाणी आकाशवाणी है, जो सत्य का प्रतीक है, दूसरी साधु वाणी प्रेम का संदेश देती है और तीसरी परमात्मा की वाणी करुणा का स्वरूप है। उन्होंने कहा कि मां अमृत है, मां का वात्सल्य और उसके अश्रु अमृत हैं। इसी प्रकार कृष्ण प्रेम या दूसरों की पीड़ा में बहने वाले साधु के अश्रु भी अमृत समान हैं।
बापू ने कहा कि उनका कोई पारंपरिक आश्रम नहीं है। “सत्य, प्रेम और करुणा का दृढ़ आश्रय ही मेरा आश्रम है।” उन्होंने कहा कि ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास शास्त्रों में वर्णित आश्रम हैं, लेकिन साधु का वास्तविक आश्रम केवल आश्रय है। उन्होंने यजुर्वेद का उल्लेख करते हुए कहा कि जल तत्व अमृत है, इसलिए मां गंगा का जल भी अमृत स्वरूप है। साधु का शब्द, स्पर्श, अंतरंग स्वरूप, रसयुक्त वाणी और उसकी दिव्य सुगंध भी अमृत के समान हैं, क्योंकि वे समाज के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
छांदोग्य उपनिषद का उल्लेख करते हुए बापू ने कहा कि कठिन से कठिन साधना और भजन के बाद भी जो अपनी विनम्रता नहीं खोता, वही सच्चा साधु है। उन्होंने कहा कि साधु अमृत कुंभ नहीं, बल्कि अमृत का कूप है। शील और नम्रता साधु की सबसे बड़ी पहचान हैं तथा अध्यात्म को कभी व्यापार नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कलियुग का प्रभाव उस साधु पर नहीं पड़ता, जो अपने शील और लोककल्याण की भावना को बनाए रखता है।
कथा प्रवाह में बापू ने रामचरितमानस की आध्यात्मिक परंपरा का भी वर्णन किया। उन्होंने बताया कि भगवान शिव के मानस से निकली यह कथा काकभुशुण्डि, गरुड़, याज्ञवल्क्य और भरद्वाज के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास तक पहुंची तथा अयोध्या में रामनवमी के दिन रामचरितमानस का प्राकट्य हुआ। इसके बाद उन्होंने शिव महिमा, शिव विवाह और भगवान श्रीराम के अवतार के कारणों का वर्णन करते हुए माता कौशल्या की गोद में भगवान श्रीराम के दिव्य प्राकट्य की कथा सुनाई। राम जन्म की मंगल बधाइयों के साथ चौथे दिन की कथा को विराम दिया गया।









