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साइकिलिंग कॉन्क्लेव 2026: आयोजन से संस्कृति तक, देशभर के साइकिल सवारों ने तय की नई राह

By: Naveen Joshi

On: Monday, August 24, 2026 5:18 PM

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देहरादून,। देश में तेजी से बढ़ रही साइकिलिंग संस्कृति को नई दिशा देने और इसे जनआंदोलन से स्थायी जीवनशैली में बदलने के उद्देश्य से देहरादून में साइकिलिंग कॉन्क्लेव 2026 का आयोजन किया गया। जीएमएस रोड स्थित होटल एफोटेल बाय सयाजी में पाहाड़ी पेडलर्स की ओर से आयोजित कॉन्क्लेव में देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे करीब 150 साइकिलिंग प्रेमियों, प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिस, सेना, पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और साइकिलिंग विशेषज्ञों ने भाग लिया।

दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र समेत विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने साइकिलिंग के विस्तार, आधारभूत सुविधाओं, सुरक्षा, युवाओं की भागीदारी और भविष्य की रणनीति पर मंथन किया। कॉन्क्लेव में यह संदेश प्रमुखता से उभरा कि अब साइकिलिंग को केवल राइड और प्रतियोगिताओं तक सीमित रखने के बजाय इसे नई पीढ़ी और समुदायों से जोड़कर एक स्थायी संस्कृति के रूप में विकसित करने की जरूरत है।

87 साल के प्रकाश नगलिया से सात वर्षीय कैवल्या तक ने बढ़ाया उत्साह

कॉन्क्लेव में साइकिलिंग के प्रति जुनून की उम्र की कोई सीमा नहीं दिखी। 87 वर्षीय प्रकाश नगलिया से लेकर महज सात वर्ष की कैवल्या तक ने इसमें प्रतिभाग किया। अलग-अलग आयु वर्ग के साइकिल सवारों की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि साइकिलिंग फिटनेस, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक जुड़ाव का माध्यम बनने के साथ हर उम्र के लोगों को जोड़ सकती है।

एक साल में बदली देहरादून की साइकिलिंग तस्वीर

कॉन्क्लेव में पिछले एक वर्ष के दौरान देहरादून में साइकिलिंग समुदाय के विस्तार की भी समीक्षा की गई। इस अवधि में 100 से अधिक नए लंबी दूरी के साइकिल सवार बीआरएम गतिविधियों से जुड़े, जबकि 30 से अधिक नए नियमित साइकिल सवार समुदाय का हिस्सा बने। करीब 30 नए लोगों ने भी साइकिलिंग शुरू की, जिनमें बच्चे, अभिभावक, युवा दंपती और व्यक्तिगत स्तर पर साइकिलिंग शुरू करने वाले लोग शामिल हैं।

पिछले छह महीनों में नए सवारों की ओर से 25 से अधिक नई साइकिलें खरीदी गईं। वहीं, देहरादून में चार नए साइकिलिंग ग्रुप भी अस्तित्व में आए। उत्तराखंड में हर माह करीब दो से तीन साइकिलिंग आयोजन हो रहे हैं। नियमित जन्मदिन राइड के अलावा साप्ताहिक विरासत और ज्ञान साझा करने वाली राइड भी आयोजित की जा रही हैं। महिलाओं और युवाओं की भागीदारी में भी लगातार वृद्धि दर्ज की गई है।

संडे ऑन साइकिल’ से कॉरपोरेट राइड तक बढ़ा दायरा

कॉन्क्लेव में देहरादून के अनुभवों को देश के बदलते साइकिलिंग परिदृश्य से जोड़कर देखा गया। फिट इंडिया के ‘संडे ऑन साइकिल’ जैसे अभियानों ने साइकिलिंग को फिटनेस और जनभागीदारी से जोड़ने का काम किया है। वहीं कॉरपोरेट क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ रही है। एचसीएल की ओर से चेन्नई, नोएडा, हैदराबाद और बेंगलुरु में साइकिलिंग रेस आयोजित की जा रही हैं।

प्रतिभागियों ने कहा कि साइकिलिंग अब केवल कुछ चुनिंदा समूहों की गतिविधि नहीं रह गई है। सरकार, कॉरपोरेट क्षेत्र, शैक्षणिक संस्थानों और नागरिक संगठनों की भागीदारी से इसका दायरा लगातार व्यापक हो रहा है।

उत्तराखंड में भी सरकारी विभागों की ओर से साइकिल रैलियों और साइकिल आधारित गतिविधियों में वृद्धि हुई है। कर्मचारियों को सप्ताह में एक दिन साइकिल से कार्यालय आने के लिए प्रोत्साहित करने की ‘नो व्हीकल डे’ जैसी पहल को भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया।

आयोजन से आगे अब स्थायी साइकिलिंग संस्कृति की जरूरत

कॉन्क्लेव में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि साइकिलिंग की सफलता को केवल राइड और आयोजनों की संख्या से नहीं आंका जाना चाहिए। जरूरी है कि नए सवारों को शुरुआती स्तर से नियमित साइकिलिंग और लंबी दूरी की गतिविधियों तक पहुंचने के लिए प्रशिक्षण, समुदाय और पर्याप्त अवसर उपलब्ध कराए जाएं।

देहरादून में एक वर्ष में 100 से अधिक नए लंबी दूरी के साइकिल सवारों का बीआरएम गतिविधियों से जुड़ना इसी बदलाव का उदाहरण है। पेरिस-ब्रेस्ट-पेरिस और आयरनमैन जैसी अंतरराष्ट्रीय स्तर की चुनौतियों में भारतीय प्रतिभागियों की बढ़ती रुचि को भी साइकिलिंग के विस्तार के संकेत के रूप में देखा गया।

2027 से स्कूल-कॉलेजों में बनेंगे साइकिलिंग क्लब

कॉन्क्लेव में वर्ष 2027 से स्कूलों और विश्वविद्यालयों में साइकिलिंग क्लब विकसित करने की योजना को भविष्य की प्रमुख दिशा के रूप में रखा गया। इसकी शुरुआत देहरादून से करने और बाद में इसे देश के अन्य शहरों एवं संस्थानों तक ले जाने की परिकल्पना है।

इन क्लबों के माध्यम से विद्यार्थियों को नियमित साइकिल राइड, सड़क सुरक्षा, साइकिल रखरखाव, साइकिलिंग संबंधी प्रशिक्षण और छोटी दूरी के आवागमन में साइकिल के उपयोग जैसी गतिविधियों से जोड़ा जाएगा। उद्देश्य केवल बच्चों को साइकिल चलाने के लिए प्रेरित करना नहीं, बल्कि कम उम्र से ही साइकिलिंग की समझ, अनुशासन और नियमितता विकसित करना है।

राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज (आरआईएमसी) देहरादून में कैडेटों की साइकिलिंग गतिविधियों को इस दिशा में उदाहरण के तौर पर रखा गया। आरआईएमसी के कमांडेंट कर्नल राहुल अग्रवाल स्वयं साइकिलिंग करते हैं और कैडेटों के साथ गतिविधियों में भाग लेते हैं। स्थानीय साइकिलिंग समुदाय और आरआईएमसी के बीच संयुक्त राइड भी आयोजित होती रही हैं।

प्रशासन से लेकर सामाजिक क्षेत्र तक ने साझा किए अनुभव

कॉन्क्लेव में उत्तराखंड सीबीआई के डीआईजी मनीष वी. सूरती, फिट इंडिया मिशन की साइकिलिंग सलाहकार, बाइसिकल मेयर नेटवर्क एवं बायक्स इंडिया फाउंडेशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं निदेशक भैरवी, सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल, टिहरी के अपर जिलाधिकारी शैलेंद्र नेगी और मैती आंदोलन के प्रणेता कल्याण सिंह रावत समेत विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों ने विचार रखे।

भैरवी ने राष्ट्रीय स्तर पर साइकिलिंग के विस्तार के अनुभव साझा करते हुए कहा कि जब आम लोग साइकिल को अपनाएंगे और सड़कों पर बड़ी संख्या में उतरेंगे, तो सरकारों के लिए भी साइकिल सवारों की जरूरतों के अनुरूप सुविधाएं विकसित करना जरूरी होगा।

सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने देहरादून की बढ़ती यातायात चुनौतियों और उनके समाधान पर चर्चा करते हुए शहर में साइकिलिंग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया।

टिहरी के अपर जिलाधिकारी शैलेंद्र नेगी ने बताया कि टिहरी के कई छोटे शहरों में साइकिलिंग के लिए स्थान विकसित करने की योजनाओं पर काम चल रहा है। उन्होंने उम्मीद जताई कि ये योजनाएं जल्द धरातल पर दिखाई देंगी। टिहरी से देहरादून को जोड़ने वाले साइकिल सर्किट पर भी काम किए जाने की जानकारी दी।

देहरादून से देशभर तक पहुंचेगा मॉडल

कॉन्क्लेव में साइकिलिंग के सामने आने वाली आधारभूत सुविधाओं, यातायात, सुरक्षा और आयोजनों से जुड़ी व्यावहारिक चुनौतियों पर भी चर्चा हुई। प्रतिभागियों ने माना कि इन चुनौतियों का समाधान केवल स्थानीय स्तर पर नहीं, बल्कि देश के विभिन्न शहरों में साइकिलिंग समुदायों, प्रशासन और संस्थानों के समन्वय से तलाशना होगा।

साइकिलिंग कॉन्क्लेव 2026 का निष्कर्ष स्पष्ट रहा कि भारत में साइकिलिंग का अगला चरण केवल साइकिल सवारों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं होगा। नई पीढ़ी, स्कूल-कॉलेज, स्थानीय समुदाय, प्रशासन और निजी क्षेत्र को साथ लेकर साइकिलिंग को दैनिक जीवन, फिटनेस, पर्यावरण और शहरी परिवहन का स्थायी हिस्सा बनाना ही आगे की सबसे बड़ी चुनौती और लक्ष्य है। देहरादून से शुरू होने वाली 2027 की साइकिलिंग क्लब पहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।

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