देहरादून,। कूर्मांचल परिषद गढ़ी कैंट शाखा की ओर से आयोजित मां नंदा-सुनंदा महोत्सव का शुभारंभ श्रद्धा, भक्ति और लोक संस्कृति के अद्भुत संगम के साथ हुआ। प्रथम दिवस ब्लूमिंग बड्स, टपकेश्वर चौक गढ़ी कैंट से माताएं, बहनें और भाई पारंपरिक पीले परिधानों में एकत्र हुए। इसके बाद पारंपरिक ढोल-दमाऊ और मसकबीन की मधुर धुनों के बीच श्रद्धालु नाचते-झूमते हुए मां नंदा-सुनंदा की मूर्ति निर्माण के लिए कदली वृक्ष लेकर सीता राम मंदिर, नींबूवाला-कौलागढ़ पहुंचे।
उत्तराखंड की लोक आस्था में मां नंदा को बेटी के रूप में देखा जाता है। इसी भाव के साथ मां नंदा-सुनंदा को उनके मायके लाने की परंपरा निभाई गई। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान और श्रद्धाभाव के साथ कदली वृक्ष का पूजन कर मां के दिव्य स्वरूप के निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की। मान्यता है कि मां नंदा-सुनंदा के दिव्य स्वरूप का निर्माण कदली वृक्ष के तने से किया जाता है।
कूर्मांचल परिषद गढ़ी शाखा की ओर से आयोजित इस नौ दिवसीय धार्मिक आयोजन में मां नंदा-सुनंदा नौ दिनों तक सीता राम मंदिर, नींबूवाला-कौलागढ़ में विराजमान रहेंगी। इस दौरान श्रद्धालुओं को मां के दर्शन और पूजा-अर्चना का पुण्य अवसर प्राप्त होगा।
आयोजन में वरिष्ठ समाजसेवी राजेंद्र सिंह बिष्ट एवं उनकी धर्मपत्नी नंदी देवी को मां नंदा-सुनंदा के माता-पिता के स्वरूप में राजा-रानी की भूमिका प्रदान की गई है। उनके द्वारा मां नंदा-सुनंदा के दिव्य स्वरूप को विधि-विधान से मंदिर में स्थापित किया जाएगा।
कार्यक्रम के धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व की जानकारी देते हुए वंदना बिष्ट ने बताया कि नंदा-सुनंदा की परंपरा में कदली वृक्ष का विशेष महत्व है। भारतीय धार्मिक परंपरा में केले के पौधे को पवित्रता, उर्वरता, समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है। नंदा देवी की लोकपरंपरा में प्रकृति और देवी-शक्ति का गहरा संबंध है। कदली वृक्ष से देवी का स्वरूप निर्मित करना इसी अटूट संबंध का प्रतीक माना जाता है।
उन्होंने बताया कि लोकमान्यता के अनुसार मां नंदा-सुनंदा महिषासुर रूपी राक्षस से बचने के लिए कदली वृक्षों में जाकर छिप गई थीं। इसी मान्यता के चलते मां नंदा और सुनंदा की प्रतिमाओं के निर्माण के लिए कदली वृक्ष का चयन किया जाता है। कदली से देवी का स्वरूप निर्मित करने की यह परंपरा प्रकृति के प्रति सम्मान और मां नंदा के प्रति उत्तराखंडवासियों की अटूट श्रद्धा को अभिव्यक्त करती है।
मां नंदा को उत्तराखंड की लोक संस्कृति में बेटी का दर्जा प्राप्त है। इसलिए उनके मायके आगमन से लेकर पूजा-अर्चना, सत्कार और विदाई तक की पूरी परंपरा में बेटी के प्रति प्रेम, वात्सल्य और भावनात्मक जुड़ाव की झलक दिखाई देती है। महोत्सव के दौरान यही भाव श्रद्धालुओं के बीच देखने को मिला।
कार्यक्रम का शुभारंभ कैंट विधायक श्रीमती सविता कपूर ने किया। इस अवसर पर कूर्मांचल परिषद के केंद्रीय अध्यक्ष कमल रजवार, गढ़ी कैंट शाखा अध्यक्ष राजेश पंत, शाखा सचिव एवं कार्यक्रम संयोजक बबीता साह लोहानी, प्रेमा तिवारी, गणेश कांडपाल, धर्मपुर शाखा के सांस्कृतिक सचिव सुंदर आगरी, वंदना बिष्ट, पवन डबराल, हरीश चंद पांडे, रमा कांडपाल, कमला उप्रेती, पुष्पा, सविता, गीता तिवारी, पुष्पा मेहरा, कल्पना वर्मा, रेनू बिष्ट, वरिष्ठ समाजसेवी जोगेंद्र पुंडीर, तारा, तनुजा तिवारी, अन्नू, कौलागढ़ पार्षद देवकी नौटियाल, लीला बिष्ट, दुर्गा सिंह कन्याल, कमला पांडेय, गिरीश चंद जोशी, सीमा जोशी सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
ढोल-दमाऊ और मसकबीन की गूंज के बीच मां नंदा-सुनंदा के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने मां से परिवार, समाज और प्रदेश की सुख-समृद्धि, शांति एवं मंगल की कामना की।
मां नंदा-सुनंदा का मायके में भव्य स्वागत, कदली वृक्ष लेकर निकली भक्तों की शोभायात्रा
By: Naveen Joshi
On: Tuesday, September 15, 2026 6:07 PM













