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जयकारों के बीच कुरुड़ सिद्धपीठ से कैलाश के लिए चली मां नंदा की बड़ी जात

By: Naveen Joshi

On: Saturday, September 5, 2026 6:11 PM

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चमोली। (प्रदीप लखेड़ा),जय मां नंदा’ के गगनभेदी जयकारों, ढोल-दमाऊं की मंगल धुन और जागरों की भक्तिमय गूंज के बीच  कुरुड़ स्थित सिद्धपीठ मंदिर से मां नंदा की पौराणिक बड़ी जात यात्रा का शुभारंभ हुआ। 12 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद जब मां नंदा की डोली मायके से कैलाश धाम के लिए रवाना हुई तो पूरा सीमांत जनपद चमोली भक्ति, श्रद्धा और भावनाओं से सराबोर हो उठा।
मां नंदा की डोली के प्रस्थान का दृश्य अत्यंत भावुक कर देने वाला रहा। मां नंदा को अपनी बेटी मानने वाली ध्याणियों की आंखें विदाई के समय छलक उठीं। किसी ने हाथ जोड़कर मां से परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली का आशीर्वाद मांगा तो किसी ने अपनी बेटी की तरह मां नंदा को विदा करते हुए मंगल गीत गाए। डोली के आगे बढ़ते ही श्रद्धालुओं के हृदय में भक्ति के साथ बेटी की विदाई का विरह भी उमड़ पड़ा।
सिद्धपीठ कुरुड़ से मां राजराजेश्वरी बधाण की नंदा डोली, कुरुड़-दशोली की नंदा डोली तथा बंड क्षेत्र की नंदा डोली अपने-अपने पौराणिक यात्रा मार्गों से हिमालय की ओर रवाना हुईं। डोलियों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी मां नंदा के जयकारे लगाते हुए यात्रा में शामिल हुए। बड़ी जात के शुभारंभ के साथ ही चमोली जनपद एक बार फिर मां नंदा की अखंड भक्ति और आराधना में डूब गया।
बेटी के रूप में पूजी जाती हैं मां नंदा
उत्तराखंड की लोक आस्था में मां नंदा को बेटी का स्वरूप माना जाता है। पहाड़ के गांव मां नंदा का मायका और कैलाश उनका ससुराल माना जाता है। इसी भावभूमि में नंदा की डोली की विदाई केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही उस आत्मीय परंपरा का प्रतीक है, जिसमें बेटी को मायके से ससुराल के लिए विदा किया जाता है।
यही कारण रहा कि शनिवार को कुरुड़ सिद्धपीठ में मां नंदा की विदाई के दौरान वातावरण श्रद्धा, भक्ति और विरह की त्रिवेणी में बदल गया। ढोल-दमाऊं की थाप और जागरों की गूंज के बीच श्रद्धालुओं ने मां नंदा से सुख-शांति, समृद्धि और समस्त क्षेत्र के कल्याण की कामना की।
अब मां नंदा की डोली कैलाश की ओर बढ़ चली है। पीछे रह गया है मायका, ध्याणियों की नम आंखें और हृदय में बस एक ही विश्वास—बेटी नंदा फिर लौटेंगी। 12 वर्ष बाद आरंभ हुई मां नंदा की यह पावन बड़ी जात एक बार फिर यह संदेश दे गई कि पहाड़ के लिए मां नंदा केवल आराध्य देवी नहीं, बल्कि हर घर की बेटी, हर हृदय की धड़कन और समूचे उत्तराखंड की लोक आस्था का जीवंत स्वरूप हैं।

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