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विरासत महोत्सव-2026 की अनगिनत यादों एवं मनमोहक संस्मरणों के साथ हुआ भव्य समापन 

By: Naveen Joshi

On: Friday, November 6, 2026 7:55 PM

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देहरादून- : पन्द्रह दिवसीय विरासत महोत्सव-2026 के 15 दिन आज पूरे हो गए हैं I आज के इस अंतिम दिवस की सांस्कृतिक संध्या-ए-महफिल जमकर जहां धूम मचाने वाली रही, वहीं लोकप्रिय व विश्व विख्यात उषा उत्थुप के कई गीतों और गायन की अद्भुत तथा लोकप्रिय अनेक भाषा शैली से ओत-प्रोत गानों एवं तरानों से “विरासत की महफिल” गुलो-गुलज़ार होकर महक उठी, जिसका भरपूर आनंद देर रात तक विरासत के सभी मेहमानों, प्रशंसकों ने भरपूर उठाया I

 

स्थानीय गढ़ी कैंट नींबू वाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र में आयोजित हुए इस 15 दिवसीय भव्य एवं आकर्षक शाही महोत्सव में भारतीय शास्त्रीय सांस्कृतिक घरानों से आईं कई नामी तथा विश्व विख्यात हस्तियों ने अपनी-अपनी शानदार,भव्य एवं राग-धुन तथा सुरों से बेहतरीन रूप में सुसज्जित प्रस्तुतियां देकर श्रोताओं/दर्शकों को न सिर्फ भाव-विभोर किया, बल्कि उनको बहुत अधिक ओत-प्रोत करते हुए उनके हृदयों को जीत भी लिया I इसी के साथ विरासत-2026 की भव्य यादें भी विरासत की मुख्य आयोजक “रिच संस्था” की यादों के पिटारे में सुसज्जित होकर एक और अध्याय विरासत के रूप में संकलित हो गई हैं I

 

आज पंद्रहवें व अंतिम दिन हुई सांस्कृतिक संध्या में सर्वप्रथम पण्डित राजन सजौर के बेहतरीन व भव्य गीत-गायन ने धूम मचाए रखी और श्रोताओं को मग्न मुग्ध भी कर दिया I प्रस्तुति की शुरुआत उन्होंने राग देश में ख़याल गायकी से की। इस दौरान उन्होंने दो बंदिशें प्रस्तुत कीं। पहली बंदिश मध्य लय में एकताल और दूसरी द्रुत लय में तीनताल पर आधारित रही। दोनों बंदिशों में राग की भावपूर्ण अभिव्यक्ति और लयकारी का सुंदर मेल देखने को मिला। इस दौरान हारमोनियम पर पंडित धर्मनाथ मिश्रा ने संगत की। उनकी सधी हुई संगत ने राजन सजौर की गायकी को और प्रभावशाली बनाया। कलाकारों के बीच सुरों और ताल का सुंदर सामंजस्य देखने को मिला।

 

शानदार एवं शाही प्रस्तुति की विरासत के मंच पर अपनी बेहतरीन बिसात बिछाने वाले पंडित राजन सजौर गया घराने का प्रतिनिधित्व करने वाले एक प्रमुख भारतीय शास्त्रीय गायक और ठुमरी प्रतिपादक हैं।

 

दरअसल, उन्होंने अपनी संगीत यात्रा पंडित जय राम तिवारी के अधीन शुरू की थी और बाद में पंडित कामेश्वर पाठक के साथ एक दशक से अधिक समय तक प्रशिक्षण लिया। वह स्वर्गीय पंडित रामजी मिश्र के गया घराने की समृद्ध ठुमरी और होली परंपराओं को संरक्षित और पुनर्जीवित करने में एक प्रमुख व्यक्ति हैं। उन्होंने अपने ख्याल और ठुमरी गायकी को निखारते हुए प्रसिद्ध पद्म विभूषण पंडित राजन और साजन मिश्रा से प्रशिक्षण लिया है।

उन्होंने प्रतिष्ठित राष्ट्रीय मंचों पर प्रदर्शन किया है, जिसमें साहित्य कला परिषद के ठुमरी महोत्सव, झंकार उत्सव, आरोहण संगीत कार्यक्रम और वाराणसी और पटना के कार्यक्रम शामिल हैं।

 

बिहार के गया में सुर सलिला गया जी गुरुकुल में, वह बच्चों को मुफ्त संगीत प्रशिक्षण देकर स्थानीय ठुमरी विरासत को जीवित रखने के लिए काम करते हैं। उन्हें ‘बी-हाई’ ग्रेड रेडियो कलाकार के रूप में पहचाना जाता है और उन्होंने दादरा, कजरी और ख्याल जैसी पारंपरिक रचनाएँ साझा भी की हैं।

 

 

ऊषा उत्थुप के मधुर, चंचल और जोशीले गायन ने युवाओं के दिलों को धड़काया…..

 

….. और बना लिया “अपना दीवाना”

 

भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में विश्व विख्यात उषा उत्थुप को आखिर कौन नहीं जानता! उनके गायन की अद्भुत गायिका शैली, राग और सुरों-धुन से निकलते राग-रस से सभी मग्न मुग्ध होते हैं I आज विरासत की इस अंतिम संध्या में उषा उत्थुप का जादू पूरी तरह से गजब ढाने वाला रहा I विरासत की इस संध्या महफिल में ऊषा उत्थुप के कदमों से हुई धमक पर युवाओं के दिलों को मिलने वाली धड़कन आज विरासत में खूब नजर आई I

 

मशहूर सिंगर उषा उथुप ने 54 वर्षों से अधिक समय तक संगीत के माध्यम से सीमाओं को पार किया है और प्रेम और एकता, शांति और सद्भाव, सहिष्णुता और ईमानदारी, और खुशी का संदेश संगीत के माध्यम से फैलाया है। भारत और विश्व भर के डिस्कोथेक से लेकर संगीत समारोहों तक, उन्होंने युवाओं को संगीत के उन मूल्यों से अवगत कराया है जो हमें इंसान बनाते हैं। वह अपने विश्वास के अनुसार जीती हैं, यहां तक कि सबसे समकालीन गीतों को भी पारंपरिक वेशभूषा में प्रस्तुत करती हैं, यह दर्शाते हुए कि भारत विश्व संस्कृतियों का एक सच्चा संगम है जिसकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है।

 

उषा उत्थुप एक पारंपरिक मध्यमवर्गीय दक्षिण भारतीय परिवार से आती हैं। उनके करियर की शुरुआत 1969 में चेन्नई के नाइन जेम्स नामक नाइटक्लब से हुई और उन्होंने सौ से अधिक एल्बम रिकॉर्ड किए हैं। वह सत्रह भारतीय भाषाओं और आठ विदेशी भाषाओं में गाती हैं। मुख्य बात यह है कि उषा की मधुरता एक सार्वभौमिक भाषा बोलती है और धर्म, जाति, राष्ट्रीयता और नस्ल से परे है। उन्होंने दूर-दराज की संस्कृतियों के लोगों को एक भारतीय महिला की एक अनूठी छवि दी है,जो कि मजबूत, स्वतंत्र, विनोदी, बुद्धिमान और प्रतिभा से परिपूर्ण है I

उन्होंने मदर टेरेसा के मिशनरीज़ ऑफ़ चैरिटी के लिए प्रेम दान, शिशु भवन और कोलकाता के कालीघाट स्थित मृत्युदंड से पीड़ित लोगों के लिए बने आश्रम के लिए धन जुटाने का काम किया है।

 

गीतों के माध्यम से विश्व के समुदायों को एकजुट करने में उनके योगदान के लिए उन्हें केन्या की चाबी से सम्मानित किया गया। उन्होंने स्पैस्टिक्स एसोसिएशन, कुष्ठ रोग अस्पताल और देश भर में कुष्ठ रोगियों के लिए बने आश्रमों के लिए व्यापक रूप से काम किया है। यही नहीं,उन्होंने अनगिनत गैर सरकारी संगठनों और सरकार के साथ मिलकर कैंसर, एड्स, महिला तस्करी और बाल शोषण पर शोध में सहयोग दिया है। उन्होंने रिचर्ड गेरे फाउंडेशन फॉर एड्स के साथ भी काम किया है। उन्होंने दक्षिण भारत में महिला सशक्तिकरण से जुड़े गैर सरकारी संगठनों, स्वयं, लाडली और कई अन्य संगठनों के साथ भी काम किया है। उन्होंने बेघर बच्चों और रेड लाइट एरिया से आने वाले बच्चों के लिए भी काम किया है। उन्होंने यूरोप, अफ्रीका और एशिया में आईसीसीआर के माध्यम से भारत का प्रतिनिधित्व किया है।

 

उन्हें वर्ष 2011 में प्रतिष्ठित पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। एक टीईडी वक्ता के रूप में उन्होंने दावोस में विश्व पर्यावरण मंच पर प्रस्तुति दी, जहां उन्हें स्टैंडिंग ओवेशन मिला। उन्हें 2011 में फिल्मफेयर पुरस्कार मिला, 2024 में प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने एक गायिका और अभिनेत्री के रूप में भी अभिनय के क्षेत्र में दिलचस्प कदम रखा है, उन्होंने कुछ मलयालम, तमिल, कन्नड़, हिंदी और भारतीय फिल्मों में काम किया है। उनकी फिल्मों और गीतों की सूची इतनी लंबी है कि यहाँ उनका उल्लेख करना संभव नहीं है, और वे अपनी सुरीली आवाज़ से आज भी अपनी पहचान बनाए हुए हैं।

 

 

 

 

होपटाउन स्कूल की छात्राओं ने ऑर्केस्ट्रा की शानदार प्रस्तुति से विरासत महोत्सव-2026 की सांस्कृतिक संध्या को बनाया संगीतमय

 

विरासत महोत्सव-2026 के मंच पर होपटाउन स्कूल की छात्राओं ने ऑर्केस्ट्रा संगीत की आकर्षक प्रस्तुति दी। छात्राओं ने विभिन्न वाद्य यंत्रों और मधुर स्वरों के माध्यम से संगीत की सुंदर संगत प्रस्तुत की। उनकी प्रस्तुति में ताल, लय और सुरों का बेहतरीन सामंजस्य देखने को मिला, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

 

इस ऑर्केस्ट्रा प्रस्तुति में ड्रम पर जसमीरा भूटानी, ऑक्टापैड पर शिक्षक गोमित शाह, की-बोर्ड पर मिशिका अग्रवाल और शिक्षक सागर गुसाईं ने संगत की। गायन में गायत्री जुयाल, सान्वी अरोड़ा, गीत सिद्धार्थ डागा, अहेली दत्ता और शिक्षिका सुमन आनंद ने अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा।

 

वहीं, तबले पर काश्वी धीमिजा और शिक्षक दिवाकर गांगुली, कैजोन पर सिया रायवानी, दरबुका पर ऋषिका सिंह और जेंबे पर हृदन्या आनंद ने तालबद्ध संगत की। गिटार पर शिक्षक दीपक थापा और समन्वय देसवाल ने प्रस्तुति को और भी मधुर एवं प्रभावशाली बनाया।

 

होपटाउन स्कूल की छात्राओं और शिक्षकों की इस सामूहिक संगीतमय प्रस्तुति ने ऑर्केस्ट्रा के विभिन्न वाद्य यंत्रों के सुंदर समन्वय को दर्शाया और विरासत महोत्सव के मंच पर एक यादगार संगीतमय माहौल बना दिया।

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