देहरादून। उत्तराखंड की समृद्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत बनाए रखने वाले ठोउड़ा मेल को इस वर्ष और अधिक भव्य, दिव्य एवं आकर्षक स्वरूप देने की तैयारियां तेज हो गई हैं। आगामी 24, 25, 26 एवं 27 अक्टूबर को प्रस्तावित ठोउड़ा मेल के सफल आयोजन को लेकर द्वितीय महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। बैठक में मेले को केवल धार्मिक आयोजन तक सीमित न रखते हुए इसे विभिन्न लोक संस्कृतियों, परंपराओं और सामाजिक समरसता का व्यापक मंच बनाने पर विशेष जोर दिया गया।
बैठक का शुभारंभ कुंदन सिंह चौहान ने किया, जबकि अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार बलदेव चंद्र भट्ट ने की। बैठक में आयोजन समिति से जुड़े पदाधिकारियों, श्रद्धालुओं, कार्यकर्ताओं तथा विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य नागरिकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। इस दौरान मेले की तैयारियों को लेकर विस्तार से मंथन किया गया और आयोजन को अधिक व्यवस्थित एवं यादगार बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए।
धर्म के साथ संस्कृति और परंपराओं का भी होगा संगम
बैठक में सबसे महत्वपूर्ण चर्चा ठोउड़ा मेल को धार्मिक आस्था के साथ सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता का उत्सव बनाने को लेकर हुई। वक्ताओं ने कहा कि देहरादून और आसपास का क्षेत्र विभिन्न संस्कृतियों और समुदायों का संगम है। यहां उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के साथ-साथ तराई-भाबर और देश के विभिन्न हिस्सों से जुड़े लोग निवास करते हैं।
विविधता को ठोउड़ा मेल में स्थान देने के उद्देश्य से कुमाऊंनी, जौनसारी, गढ़वाली, गोरखाली, पंजाबी तथा तराई-भाबर क्षेत्र में निवास करने वाले विभिन्न समुदायों की लोक संस्कृति को कार्यक्रम का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया।
मेले में संबंधित समुदायों की लोक कला, लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा, खान-पान, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक परंपराओं की झलक प्रस्तुत करने की योजना पर चर्चा हुई। इससे मेले में आने वाले श्रद्धालुओं एवं दर्शकों को उत्तराखंड सहित विभिन्न क्षेत्रों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को करीब से जानने और समझने का अवसर मिलेगा।
एक मंच पर नजर आएगी सांस्कृतिक एकता की तस्वीर
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि ठोउड़ा मेल की विशेषता उसकी धार्मिक आस्था के साथ समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने की क्षमता है। अलग-अलग समुदायों की संस्कृति को एक मंच पर लाने से ‘अनेकता में एकता’ की भावना को मजबूती मिलेगी।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोक परंपराओं से जोड़ना बेहद जरूरी है। ऐसे आयोजन युवाओं को अपनी संस्कृति को समझने और उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करते हैं। ठोउड़ा मेल इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
वक्ताओं ने कहा कि मेले में जब कुमाऊंनी, जौनसारी, गढ़वाली, गोरखाली और पंजाबी लोक संस्कृति के रंगों के साथ तराई-भाबर की विविध सांस्कृतिक परंपराएं एक साथ नजर आएंगी तो यह आयोजन सांस्कृतिक समागम का भव्य स्वरूप प्रस्तुत करेगा।
श्रद्धालुओं की सुविधा सर्वोच्च प्राथमिकता
बैठक में मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं को लेकर भी विस्तार से चर्चा हुई। आयोजन को सफल बनाने के लिए आवागमन, पार्किंग, बैठने की व्यवस्था, पेयजल, स्वच्छता, प्रकाश व्यवस्था, सुरक्षा, चिकित्सा सहायता तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं को बेहतर बनाने पर सुझाव दिए गए।
कार्यकर्ताओं ने कहा कि चार दिवसीय मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और दर्शकों के पहुंचने की संभावना है। ऐसे में भीड़ प्रबंधन और यातायात व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया जाना आवश्यक है। आयोजन स्थल पर आने वाले श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो, इसके लिए विभिन्न व्यवस्थाओं को समय रहते अंतिम रूप देने पर जोर दिया गया।
कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों पर भी हुआ मंथन
बैठक में मेले की तैयारियों में जुटे कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय और जिम्मेदारियों के स्पष्ट निर्धारण को लेकर भी चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि किसी भी बड़े धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन की सफलता सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करती है।
इसके लिए अलग-अलग व्यवस्थाओं से जुड़े कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी सौंपने, आपसी संवाद बनाए रखने और आयोजन के दौरान त्वरित निर्णय लेने की व्यवस्था पर भी विचार किया गया। सभी कार्यकर्ताओं से मेले की गरिमा और परंपरा को ध्यान में रखते हुए अनुशासन एवं सेवा भाव के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने का आह्वान किया गया।
भव्यता के साथ दिखेगी उत्तराखंड की पहचान
बैठक में इस बात पर भी जोर दिया गया कि ठोउड़ा मेल की भव्यता आधुनिक व्यवस्थाओं के साथ-साथ उत्तराखंड की पारंपरिक पहचान से भी जुड़ी हो। मेले में स्थानीय लोक कलाकारों और सांस्कृतिक प्रतिभाओं को अवसर देने तथा पारंपरिक कला एवं संस्कृति को प्रोत्साहित करने पर भी विचार किया गया।
वक्ताओं ने कहा कि ठोउड़ा मेल को ऐसा स्वरूप दिया जाना चाहिए, जिसमें आस्था, परंपरा, लोक संस्कृति, सामाजिक सहभागिता और आधुनिक व्यवस्थाओं का सुंदर समन्वय दिखाई दे।
सामाजिक समरसता का संदेश देगा आयोजन
बैठक में कहा गया कि ठोउड़ा मेल धार्मिक आस्था का केंद्र होने के साथ समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने वाला आयोजन भी बने। कुमाऊं, गढ़वाल, जौनसार, तराई-भाबर तथा अन्य क्षेत्रों से जुड़े लोगों की सहभागिता से मेले में उत्तराखंड की व्यापक सांस्कृतिक पहचान उभरकर सामने आएगी।
वक्ताओं ने कहा कि अलग-अलग बोलियों, परंपराओं और संस्कृतियों के बावजूद सभी की भावनाएं एक हैं। इसी भावना को ठोउड़ा मेल के माध्यम से मजबूत किया जा सकता है। आयोजन में सभी समुदायों की भागीदारी से भाईचारे, प्रेम, सौहार्द और सामाजिक एकता का संदेश दूर तक जाएगा।
बैठक में मौजूद श्रद्धालुओं एवं कार्यकर्ताओं में आयोजन को लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। सभी ने अपने स्तर से अधिक से अधिक लोगों को मेले से जोड़ने और आयोजन को सफल बनाने का संकल्प लिया। बैठक में आए सुझावों को आगामी बैठकों में शामिल करते हुए व्यवस्थाओं को अंतिम रूप देने पर सहमति बनी।
वक्ताओं ने कहा कि इस बार ठोउड़ा मेल को ऐसा स्वरूप देने का प्रयास किया जा रहा है, जिसकी भव्यता के साथ-साथ उसकी धार्मिक गरिमा और सांस्कृतिक पहचान भी लंबे समय तक लोगों के मन में बनी रहे।
बैठक में राज्य मंत्री जोत सिंह बिष्ट, ज्योति राजवार, ममता पागती, संजना कुनियाल, कल्पना राठौर, पूनम सती, अभय कुमार, नरेश शाह, अनिल बिष्ट, हरीश सामंत, डॉ. अभिनव कुमार, आचार्य विमल पांडे, बसंत शर्मा, अंजना, हेमंत, नरेश, राम गोयल, राजेंद्र सिंह बिष्ट, विपिन, नरेश सिंह, उर्मिला चौहान, निकेश वर्मा, हरीश धामी समेत बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं, श्रद्धालुओं एवं गणमान्य नागरिकों ने सक्रिय सहभागिता निभाई।
ऐतिहासिक आयोजन बनाने का लिया संकल्प
बैठक के अंत में उपस्थित सभी लोगों ने एकजुट होकर संकल्प लिया कि सामूहिक सहयोग, आपसी समन्वय और सेवा भावना के साथ आगामी ठोउड़ा मेल को भव्य, दिव्य, सुव्यवस्थित एवं ऐतिहासिक बनाया जाएगा।
सभी ने आयोजन की तैयारियों में पूर्ण सहयोग देने का भरोसा दिलाते हुए कहा कि ठोउड़ा मेल केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक एकता का ऐसा उत्सव बने, जिसमें देहरादून की बहुरंगी सांस्कृतिक पहचान एक ही मंच पर दिखाई दे।













