देहरादून,
उत्तरकाशी जनपद के धराली क्षेत्र में 5 अगस्त को खीरगंगा में आए भीषण सैलाब ने कई परिवारों को असहनीय दुख दिया। खीरगंगा, मां गंगा की सहायक नदी मानी जाती है, जो ऊपर पर्वतों से निकलकर भगीरथी में समाहित हो जाती है। मान्यता है कि प्राचीन समय में यहां से खीर बहती थी। भगवान कार्तिकेय ने इस पावन स्थल की गुफा में निवास किया और बाद में परशुराम ने खीर को जल में परिवर्तित कर दिया, जो आज भी दूध जैसी श्वेत धारा के रूप में बहती है। इसी कारण इसे खीरगंगा कहा जाता है। लोकमान्यताओं के अनुसार, खीरगंगा गंगा मैया की बहन कही जाती है।
धराली और मुखबा – मां गंगा का मायका
हालिया आपदा के बाद क्षेत्र में यह चर्चा फिर से प्रबल हो गई कि धराली को मां गंगा का मायका कहा जाता है। उत्तरकाशी की पवित्र भूमि को मां गंगा का उद्गम स्थल माना गया है, जहां गौमुख से निकलकर गंगा संपूर्ण भारतवर्ष को जीवनदान देती हैं। मुखबा और धराली गांव भगीरथी नदी के आर-पार स्थित हैं। मुखबा गांव को विशेष रूप से गंगा मैया का मायका माना जाता है, क्योंकि यहां उनके शीतकालीन प्रवास की परंपरा है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, मुखबा गांव मंगत ऋषि की तपोभूमि है। कहा जाता है कि ऋषि ने मां गंगा से वरदान स्वरूप यह निवेदन किया था कि शीतकाल में वह इस स्थान पर निवास करें ताकि ग्रामीण उनकी आराधना कर सकें। तभी से शीतकालीन प्रवास की परंपरा चली आ रही है। यहां मुखीमठ मंदिर स्थित है, जो गंगोत्री धाम की प्रतिकृति है।
बेटी की तरह होता है गंगा मैया का स्वागत
हर वर्ष गंगोत्री धाम के कपाट बंद होने पर मां गंगा की भोगमूर्ति उत्सव डोली मुखबा मंदिर लाई जाती है। छः माह तक यहां गंगा मैया का निवास होता है। ग्रामीण धूप, दीप और फूलों से उनका स्वागत एक बेटी की भांति करते हैं। इस आस्था और श्रद्धा ने मुखबा गांव को मां गंगा का मायका स्थापित किया है।
