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नाबार्ड ने राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर मुंबई में तीन दिवसीय प्रदर्शनी का आयोजन किया

By: Naveen Joshi

On: Friday, August 7, 2026 1:41 PM

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देहरादून, : भारत की समृद्ध हथकरघा विरासत के संरक्षण तथा पारंपरिक बुनकर समुदायों की आजीविका को सशक्त बनाने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हुए, राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) 5 से 7 अगस्त 2026 तक मुंबई के बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) स्थित अपने प्रधान कार्यालय में प्रदर्शनी-सह-बिक्री का आयोजन कर रहा है।

 

इस प्रदर्शनी में देश की 15 विशिष्ट हथकरघा परंपराओं का प्रतिनिधित्व करने वाले उत्पाद प्रदर्शित किए जाएंगे। इनमें महाराष्ट्र की पैठणी, तेलंगाना की पोचमपल्ली इकट, राजस्थान की कोटा डोरिया, ओडिशा की संबलपुरी, बिहार की भागलपुर सिल्क, पश्चिम बंगाल की कांथा स्टिच, गुजरात के कच्छ शॉल, आंध्र प्रदेश की वेंकटगिरि, तमिलनाडु की अरनी सिल्क, केरल की बलरामपुरम, उत्तर प्रदेश की मुबारकपुर, हरियाणा की अंबाला हैंडलूम्स, मध्य प्रदेश की बाघ, झारखंड की भगैया सिल्क तथा कर्नाटक की उत्तरिया शामिल हैं।

 

प्रदर्शनी में आगंतुकों को उत्पादकों से सीधे प्रामाणिक हथकरघा उत्पादों को देखने और खरीदने का अवसर मिलेगा।

 

 

इसके अतिरिक्त खरीदार-विक्रेता बैठक का भी आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य कारीगरों, उत्पादक समूहों, संस्थागत खरीदारों तथा बाजार से जुड़े हितधारकों के बीच संवाद को बढ़ावा देना, नए व्यावसायिक अवसरों का सृजन करना तथा दीर्घकालिक बाजार संपर्कों को मजबूत करना है।

 

 

 

हथकरघा क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के अपने सतत प्रयासों के तहत नाबार्ड अपने प्रधान कार्यालय तथा क्षेत्रीय कार्यालयों में प्रदर्शनी, जन-जागरूकता कार्यक्रमों और बाजार संवर्धन गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का आयोजन करता रहा है।

 

 

बैंक ने पारंपरिक हथकरघा उत्पादों के भौगोलिक संकेतक (जीआई) पंजीकरण, आजीविका विकास एवं कौशल उन्नयन कार्यक्रमों तथा ग्रामीण उद्यम उत्पादक संगठनों के माध्यम से हथकरघा कारीगरों के सामूहिकीकरण को भी सहयोग प्रदान किया है।

 

 

इन पहलों से बाजार तक पहुंच मजबूत होती है, मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिलता है और सतत ग्रामीण आजीविका को प्रोत्साहन मिलता है, साथ ही भारत की समृद्ध पारंपरिक बुनाई विरासत के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलता है।

 

 

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस प्रतिवर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है। यह दिवस 1905 में स्वदेशी आंदोलन की शुरुआत की स्मृति में मनाया जाता है तथा भारत के हथकरघा बुनकरों द्वारा देश की सांस्कृतिक विरासत, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में दिए गए अमूल्य योगदान को सम्मानित करने का अवसर प्रदान करता है।

 

 

 

 

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