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‘श्रद्धा–सम्मान : लोकपितृ स्मरण समारोह’ 2 अक्टूबर से

By: Naveen Joshi

On: Wednesday, September 30, 2026 8:35 PM

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देहरादून। पितृपक्ष भारतीय संस्कृति में अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, स्मरण और सम्मान व्यक्त करने का पावन अवसर है। इसी सांस्कृतिक भावना को उत्तराखंड की कला, साहित्य, संगीत, फिल्म और लोकजीवन से जोड़ते हुए ‘आवाज़ सुनो पहाड़ों की’ एवं ‘शारदा स्वर संगम’ के संयुक्त तत्वावधान में 2 से 4 अक्टूबर 2026 तक ‘श्रद्धा–सम्मान : लोकपितृ स्मरण समारोह 2026’ का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम संस्कृति विभाग ऑडिटोरियम, हरिद्वार बाईपास रोड, देहरादून में दोपहर 12 बजे से रात 8 बजे तक आयोजित होगा।
आयोजकों के अनुसार यह आयोजन महज श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संजोने और उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है। समारोह में उन दिवंगत कलाकारों, साहित्यकारों, फिल्मकारों और सांस्कृतिक विभूतियों को ‘लोकपितर’ के रूप में स्मरण किया जाएगा, जिन्होंने अपनी साधना और प्रतिभा से उत्तराखंड की लोकभाषा, लोककला, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक पहचान को समृद्ध किया।
परिजनों का होगा सम्मान
समारोह के दौरान दिवंगत कलाकारों एवं सांस्कृतिक विभूतियों के परिवारजनों को सम्मानित किया जाएगा। साथ ही उनके गीतों, रचनाओं और सांस्कृतिक योगदान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘अमर गीतों से नमन’, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, संवाद और स्मरण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। आयोजकों का कहना है कि कलाकार का जीवन भले ही समाप्त हो जाए, लेकिन उसकी कला और सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाना समाज की जिम्मेदारी है।
सांस्कृतिक महासंवाद में मंथन
समारोह का प्रमुख आकर्षण ‘सांस्कृतिक महासंवाद’ होगा। इसमें फिल्म एवं फिल्म नीति, नाटक एवं रंगमंच, बोली-भाषा एवं साहित्य, लोक परंपरा एवं सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक प्रतिभाओं के प्रोत्साहन, फिल्मों में संस्कृति-कला एवं साहित्य की भूमिका, गांवों की संस्कृति से नई संभावनाएं तथा संस्कृति संरक्षण एवं नीति-निर्माण जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी।
महासंवाद का उद्देश्य केवल विचार-विमर्श तक सीमित न रहकर उत्तराखंड की संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए व्यावहारिक सुझाव और भविष्य की कार्यदिशा तैयार करना है। इन सुझावों को शासन, प्रशासन एवं संबंधित संस्थाओं के समक्ष भी रखा जाएगा।
गांवों की संस्कृति को अवसरों से जोड़ने पर जोर
आयोजकों के मुताबिक उत्तराखंड की संस्कृति केवल मंचों या संग्रहालयों तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति गांवों, लोकभाषाओं, लोकगीतों, लोकवाद्यों और परंपराओं को पीढ़ियों से जीवित रखने वाले लोगों में है। समारोह में इस बात पर भी मंथन होगा कि लोकसंस्कृति को रोजगार, पर्यटन, फिल्म, स्थानीय प्रतिभाओं और युवाओं के अवसरों से कैसे जोड़ा जाए।
आयोजकों का कहना है कि संस्कृति संरक्षण के साथ आजीविका और पलायन जैसे विषयों पर भी सकारात्मक दिशा विकसित करने की जरूरत है। इसी उद्देश्य से ‘स्मृति से सम्मान, सम्मान से विरासत और विरासत से भविष्य का संकल्प’ की भावना के साथ समारोह को एक व्यापक सांस्कृतिक पहल के रूप में आयोजित किया जा रहा है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये रहे मौजूद
समारोह की जानकारी देने के लिए आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में संयोजक नरेंद्र रौथाण, समाजसेवी बलदेव भट्ट, वरिष्ठ लोक कलाकार नंदलाल भारती, नीरज उनियाल, मंच संचालक कविता बिष्ट, लोक गायिका लीला पयाल, लोक गायिका मीना बिष्ट, मनोज सिंह, प्रीतिक्षा बमराड़ा, पूनम सती सहित अन्य लोग मौजूद रहे।

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