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108 सीमावर्ती गांवों तक पहुंचेगी स्वास्थ्य सुविधा, उत्तराखंड सरकार और आईटीबीपी में समझौता

 

देहरादून।, सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की दिशा में उत्तराखंड सरकार ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम उठाया है। मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी की उपस्थिति में  मुख्यमंत्री आवास में उत्तराखंड शासन और भारत–तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के मध्य ‘स्वस्थ सीमा अभियान’ के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए। इस अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री डॉ. धन सिंह रावत एवं कैबिनेट मंत्री श्री सौरभ बहुगुणा भी मौजूद रहे।

इस एमओयू का मुख्य उद्देश्य पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी जनपदों के 108 सीमावर्ती गांवों में निवासरत नागरिकों को एकीकृत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है। अभियान को प्रथम चरण के रूप में प्रारंभ किया जा रहा है, जिसके माध्यम से दुर्गम और सीमांत क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की प्रभावी पहुंच सुनिश्चित की जाएगी।

समझौते के तहत भारत–तिब्बत सीमा पुलिस, मुख्यालय उत्तरी सीमांत, देहरादून को प्रथम पक्ष तथा चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, उत्तराखंड सरकार को द्वितीय पक्ष नामित किया गया है। एमओयू के अनुसार आईटीबीपी द्वारा योग्य चिकित्सक, पैरामेडिकल स्टाफ, उपलब्ध एमआई रूम और टेली-मेडिसिन सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार सीमावर्ती गांवों में नियमित भ्रमण कर स्थानीय नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाएं दी जाएंगी। साथ ही मेडिकल हेल्थ कार्ड/रिकॉर्ड का संधारण, आवश्यक उपकरणों, दवाइयों एवं उपभोग्य सामग्रियों का सुव्यवस्थित प्रबंधन भी किया जाएगा।

वहीं राज्य सरकार संबंधित गांवों के जनसांख्यिकीय आंकड़े उपलब्ध कराएगी तथा प्रारंभिक स्तर पर आवश्यक चिकित्सा उपकरणों की व्यवस्था करेगी। उपभोग के आधार पर प्रत्येक छह माह में दवाइयों एवं अन्य सामग्रियों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। आपातकालीन परिस्थितियों में निकासी, दूरसंचार सहायता, उपकरणों के स्वामित्व एवं आवश्यक प्रतिस्थापन की जिम्मेदारी भी राज्य सरकार की होगी।

मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी ने इस अवसर पर कहा कि ‘स्वस्थ सीमा अभियान’ सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की दिशा में एक प्रभावी पहल है। यह न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करेगा, बल्कि सीमांत गांवों में विश्वास, सुरक्षा और स्थायित्व को भी बढ़ावा देगा। उन्होंने कहा कि सरकार सीमांत क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध है और यह एमओयू उसी दिशा में एक मजबूत कदम है।

इस अवसर पर आईटीबीपी अधिकारियों ने जानकारी दी कि उत्तराखंड सरकार और आईटीबीपी के बीच पूर्व में स्थानीय उत्पादों की आपूर्ति को लेकर किए गए एमओयू के तहत नवंबर 2024 से 25 प्रतिशत आपूर्ति ट्रायल आधार पर और मार्च 2025 से 100 प्रतिशत आपूर्ति प्रारंभ कर दी गई है। इसके अंतर्गत जीवित भेड़/बकरी, जीवित मुर्गा, हिमालयन ट्राउट मछली, ताजा दूध, पनीर एवं टीपीएस जैसे उत्पादों की खरीद विभिन्न सहकारी संस्थाओं के माध्यम से की जा रही है। अब तक लगभग 3,79,650.23 किलोग्राम एवं 3,25,318.72 लीटर उत्पादों की खरीद की जा चुकी है, जिसकी अनुमानित लागत ₹11.94 करोड़ से अधिक है। इस पहल से राज्य के पशुपालकों, मत्स्य पालकों एवं दुग्ध उत्पादकों को सीधा लाभ मिला है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पहल सीमावर्ती क्षेत्रों को आत्मनिर्भर बनाने, स्थानीय नागरिकों को आजीविका से जोड़ने तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े क्षेत्रों में स्थायित्व सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी।

कार्यक्रम में वर्ष 2026 के लिए वाइब्रेंट/बॉर्डर ग्रामों से स्थानीय उत्पादों की प्रस्तावित खरीद का विस्तृत विवरण भी प्रस्तुत किया गया। इसके तहत जीवित भेड़/बकरी, मुर्गा, हिमालयन ट्राउट मछली, पनीर, ताजा दूध, टीपीएस, सब्जियों और फलों की खरीद की योजना है, जिसकी कुल अनुमानित लागत लगभग 32.76 करोड़ रुपये बताई गई।

इसके अतिरिक्त आगामी एमओयू के तहत स्थानीय पशुपालकों से नॉन-वेज उत्पादों की सीधी खरीद प्रक्रिया को और मजबूत करने, मध्यस्थों की भूमिका समाप्त करने तथा उत्पादकों को प्रत्यक्ष लाभ देने का प्रस्ताव है। वहीं उत्तराखंड पर्यटन विभाग के साथ हेलीपैड समझौते के अंतर्गत अब तक 221 हेली लैंडिंग सफलतापूर्वक कराई जा चुकी हैं, जिससे सीमावर्ती और दुर्गम क्षेत्रों में संपर्क एवं आपूर्ति व्यवस्था बेहतर हुई है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पहल वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को मजबूती देने के साथ ही ‘वोकल फॉर लोकल’ की अवधारणा को धरातल पर उतार रही है। प्वाइंट टू प्वाइंट मॉडल के माध्यम से किसानों से सीधी खरीद सुनिश्चित की गई है, जिससे 550 से अधिक सीमावर्ती निवासी लाभान्वित हुए हैं और ठेकेदार व दलाल व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हुई है।

उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था से सीमांत क्षेत्रों में नए रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं, रिवर्स माइग्रेशन को बढ़ावा मिला है और पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह मॉडल अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुआ है। समग्र रूप से यह पहल सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय संतुलन के साथ सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

कार्यक्रम में सचिव डॉ. बी.वी.आर.सी. पुरुषोत्तम, आईजी आईटीबीपी  संजय गुंज्याल सहित आईटीबीपी के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित

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