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उत्तराखंड

सेंट्रियो मॉल में दिखा पहाड़ी संस्कारों का गौरव, अंशिका को सराहना

देहरादून। आधुनिकता की चकाचौंध के बीच अपनी जड़ों, भाषा और पारंपरिक पहनावे को गर्व के साथ सहेजना आज के दौर में विरल होता जा रहा है। ऐसे में मात्र 13 वर्ष की आयु में देहरादून जैसे आधुनिक शहर में रहते हुए अपनी सांस्कृतिक पहचान को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करना निश्चित ही प्रशंसनीय है।

गणतंत्र दिवस के अवसर पर सेंट्रियो मॉल जैसे सार्वजनिक मंच पर अंशिका बिष्ट द्वारा अपनी सांस्कृतिक पहचान का प्रदर्शन न केवल उनके आत्मबल और आत्मविश्वास को दर्शाता है, बल्कि युवा पीढ़ी के लिए एक सशक्त प्रेरणा भी है।

सांस्कृतिक गौरव का उदाहरण

शहरी जीवनशैली में अक्सर बच्चे अपनी पारंपरिक जड़ों से दूर हो जाते हैं, लेकिन अंशिका ने यह सिद्ध कर दिया कि पहाड़ी होना गर्व की बात है और अपनी संस्कृति को अपनाकर भी आधुनिक समाज में सम्मान के साथ आगे बढ़ा जा सकता है।

भाषा और पारंपरिक पहनावे का संरक्षण

अपनी मातृभाषा का प्रयोग और पारंपरिक परिधान धारण करना सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम है। अंशिका ने इस माध्यम से अपनी सांस्कृतिक चेतना का परिचय दिया।

युवाओं के लिए प्रेरणा

उनकी यह प्रस्तुति विशेष रूप से उन प्रवासी परिवारों और युवाओं के लिए एक संदेश है, जो समय के साथ अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं। ‘जेठू बुलाण तेथू पछाड़’ जैसी कहावत को अंशिका ने अपने आचरण से चरितार्थ किया है।

अंशिका बिष्ट के उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं। आशा है कि वे आगे भी अपनी कला और संस्कृति के माध्यम से उत्तराखंड का नाम रोशन करती रहेंगी।

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