,

क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ इंडिया के दूसरे दिन न्याय, शक्ति और सार्वजनिक विश्वास पर चर्चा

By: Naveen Joshi

On: Saturday, December 13, 2025 10:08 PM

Google News
Follow Us
------

 

*लेफ्टिनेंट जनरल ए.के. सिंह, पूर्व एसीपी मधुकर झेंडे, अभिनेत्री अनुरित्ता के. झा, न्यायाधीश आर.के. गौबा, फिल्म निर्माता, पत्रकार और लेखकों ने देहरादून में दूसरे दिन की गतिविधियों का नेतृत्व किया*

 

देहरादून* : क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल ऑफ इंडिया के दूसरे दिन की शुरुआत हयात सेंट्रिक, देहरादून में हुई, जिसमें अपराध, न्याय, शक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी पर व्यापक चर्चा हुई। कार्यक्रम में विभिन्न आयु और पेशे के दर्शकों ने भाग लिया।

 

दिन की शुरुआत सत्र “प्रेस 9 एंड डायल 100: इनसाइड इंडिआस क्राइम लाइन्स” से हुई, जिसमें लेखक कुलप्रीत यादव और पत्रकार-फिल्म निर्माता शैलेन्द्र झा ने अजय दयाल के साथ बातचीत करी। कुलप्रीत यादव ने कहा कि उनकी रचनाएँ वास्तविक जीवन के अनुभवों से प्रेरित होती हैं और गैर-फिक्शन में कहानी को रोचक बनाना जरूरी है क्योंकि इसकी समाप्ति पहले से ज्ञात होती है। शैलेन्द्र झा ने बताया कि वे अपनी कहानियों को एक केंद्रीय विचार और मजबूत पात्रों के आधार पर बनाते हैं और ‘प्रेस 9’ उन्होंने साइबर अपराध और अपराध के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए लिखी।

 

इसके बाद “लाइसेंस टू वायोलेट? एवरीडे लॉलेसनेस ऑन इंडियन रोड्स” सत्र हुआ, जिसमें आईजी नीलेश भर्ने ने ट्रैफिक प्रबंधन के तीन ई—एनफोर्समेंट, इंजीनियरिंग और एजुकेशन—के महत्व पर ज़ोर दिया। एसपी लोकजीत सिंह ने कहा कि दुर्घटनाओं को रोकने के लिए अवसंरचना, जागरूकता और पुलिसिंग का संयोजन आवश्यक है। राहुल कोटियाल ने अव्यवस्थित विकास और नीति की कमी को जिम्मेदार ठहराया, साथ ही सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। एडिशनल एसपी जया बलूनी ने बताया कि सड़क अनुशासन केवल डर से नहीं बल्कि जागरूकता और व्यक्तिगत जिम्मेदारी से आता है। सत्र की अध्यक्षता सुप्रिया चंदोक ने की।

 

सत्र “दास्तान-ए-देसी पल्प” में लेखक यशवंत व्यास और सुभोध भारतीय, प्रकाशक रंधीर कुमार अरोड़ा एवं संजीव मिश्रा ने पल्प साहित्य की विरासत और प्रासंगिकता पर चर्चा की। व्यास ने बताया कि पल्प कभी अपराध, रोमांस और थ्रिल का समग्र अनुभव देता था, लेकिन अब इसकी पहचान कम हो गई है। सुभोध भारतीय ने पल्प को सरल और मनोरंजक साहित्य बताया, जो अब साइबर अपराध जैसी नई कहानियों के साथ विकसित हो रहा है। अरोड़ा ने कहा कि बच्चों की बौद्धिक वृद्धि के लिए पाठ्यपुस्तकों से आगे देखना जरूरी है। इस सत्र में ‘स्वर्ण कटार पुरस्कार’, भारत का सबसे बड़ा क्राइम लेखन सम्मान, अगले साल से फेस्टिवल के सहयोग से शुरू किए जाने की घोषणा भी की गई, और यशवंत व्यास की किताब ‘बेगमपुल से दरियागंज’ का विमोचन भी हुआ।

 

दिन के एक अन्य सत्र, “चैसिंग द सरपेंट: द चार्ल्स सोभराज फाइल्स”, में पूर्व एसीपी और लेखक मधुकर झेंडे ने रूपा सोनी के साथ चर्चा की। झेंडे ने सोभराज के अपराध की शुरुआत की कहानी साझा की, जो वाहन चोरी से शुरू हुई थी, और याद दिलाया कि उसके एक साथी ने एक रिवॉल्वर सौंपते हुए एक बड़े डकैती की योजना का खुलासा किया था। उन्होंने सोभराज को भारतीय इतिहास के सबसे चतुर अपराधियों में से एक बताया और कहा कि तिहार जेल से उसकी फरारी उस समय की सबसे सनसनीखेज अपराध कहानियों में से एक बन गई थी।

 

“वुमेन एंड क्राइम: अंडरस्टैंडिंग द ट्रिगर्स” सत्र में शाश्वत बाजपेई, कमांडेंट श्वेता चौबे, लेखक रूबी गुप्ता और एसपी लाहौल एवं स्पीती शिवानी मेहला ने भाग लिया, और सत्र का संचालन शक्ति मनोचा ने किया। पैनल ने महिलाओं के अपराध में शामिल होने के पीछे जटिल सामाजिक और मानसिक कारकों को उजागर किया। शाश्वत बाजपेई ने वास्तविक मामलों का उदाहरण देते हुए बताया कि भावनात्मक उपेक्षा और व्यक्तिगत परिस्थितियाँ अपराध की ओर ले जा सकती हैं, साथ ही चेतावनी दी कि ओटीटी प्लेटफॉर्म अक्सर जागरूकता और अतिशयोक्ति के बीच की सीमा को धुंधला कर देते हैं। कमांडेंट श्वेता चौबे ने कहा कि आघात और नशे की लत महिलाओं को अपराध की ओर धकेलने वाले प्रमुख कारण हैं। लेखक रूबी गुप्ता ने बताया कि महिला अपराधी अक्सर लंबी अवधि के भावनात्मक, शारीरिक और सामाजिक उत्पीड़न की वजह से अपराध की राह अपनाती हैं। एसपी शिवानी मेहला ने जोड़ा कि लाहौल–स्पीती जैसे दूरदराज़ क्षेत्रों में कठिन भू-भाग और जलवायु कानून प्रवर्तन और न्याय तक पहुँच में गंभीर चुनौतियाँ पैदा करती हैं।

 

सत्र “फॉरगॉटन बिहाइंड बार्स: जस्टिस डिलेड, जस्टिस डिनाइड” में डॉ. ऐश्वर्या महाजन, न्यायाधीश आर.के. गौबा और ऐडीजी इंटेलिजेंस एवं सिक्योरिटी अभिनव कुमार ने पूजा मरवाह के साथ चर्चा की। डॉ. महाजन ने बताया कि बहुत बड़े हिस्से के अंडरट्रायल मासूम होते हैं, जो शक्ति की कमी के कारण फंस जाते हैं और कैदियों के साथ रहने से नकारात्मक प्रभाव झेलते हैं। उन्होंने सुधार गृहों में सुधार और पुनर्वास की आवश्यकता पर भी जोर दिया। अभिनव कुमार ने एफआईआर रजिस्ट्रेशन, जांच और मामलों की प्राथमिकता में प्रणालीगत पक्षपात पर प्रकाश डाला, जो अक्सर शक्तिशाली पक्ष को लाभ पहुंचाता है। जस्टिस आर.के गौबा ने महत्वपूर्ण मामलों और पुलिसिंग की संरचनात्मक विशेषताओं के माध्यम से अपने अनुभव साझा किए।

 

अन्य सत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया गया, “डिस्मैंटलिंग टेरर नेटवर्क्स: लेसंस फ्रॉम रेड फोर्ट” में पूर्व डीजीपी उत्तराखंड अशोक कुमार, सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल ऐ के सिंह और सेवानिवृत्त कर्नल सुनील कोटनाला ने शम्स ताहिर खान के मार्गदर्शन में आतंकवाद रोधी रणनीतियों और खुफिया समन्वय पर चर्चा की। इस सत्र में अशोक कुमार ने बताया, ““कश्मीर की समस्या की जड़ सीमा पार है। पाकिस्तान चुप बैठने वाला नहीं है, इसलिए हमें निरंतर सतर्क रहना होगा। केवल खुफिया जानकारी पर्याप्त नहीं है। आतंकवाद से लड़ने के लिए ठोस कार्रवाई और अडिग इच्छाशक्ति की आवश्यकता है, ताकि ज़ुल्म और जिहाद दोनों का सामना किया जा सके।”

 

लेफ्टिनेंट जनरल अजय कुमार सिंह ने हमलों को रोकने में खुफिया जानकारी की अहमियत और स्वदेशी तकनीक के उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। कर्नल सुनील कोटनाला ने बताया कि आतंकवादी मोबाइल आधारित कट्टरपंथ का उपयोग करते हैं, जिससे शहरी आतंकवाद के खिलाफ अभियान जटिल और आम नागरिकों के लिए जोखिमपूर्ण हो जाते हैं।

 

इसके बाद ‘मिशन साउदी: इंडिआस फर्स्ट-एवर एक्सट्रडीशन ऑफ़ ए रेप अक्क्यूस्ड’ सेशन आयोजित किया गया, जिसमें पूर्व डीजी उत्तराखंड आलोक लाल और लेखक मानस लाल ने अनिर्बान भट्टाचार्य के साथ सीमा-पार न्याय और जांच में धैर्य पर चर्चा की।

Static 1 Static 1

Naveen Joshi

For Feedback - feedback@example.com

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now

Related News

Leave a Comment