देहरादून , गंगा नदी में संकटग्रस्त डॉल्फिन के त्वरित रेस्क्यू के लिए अब ‘डॉल्फिन एंबुलेंस’ सेवा शुरू की गई है। 108 एंबुलेंस की तर्ज पर विकसित इस विशेष सेवा का शुभारंभ देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल ने किया। यह पहल नमामि गंगे मिशन के अंतर्गत गंगा डॉल्फिन संरक्षण की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान के अनुसार, डॉल्फिन एंबुलेंस अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस है। इसमें ऑक्सीजन सपोर्ट सिस्टम, प्राथमिक उपचार किट, विशेष स्ट्रेचर, पानी का तापमान नियंत्रित रखने की व्यवस्था और वैज्ञानिक उपकरण शामिल हैं। सूचना मिलते ही एंबुलेंस सड़क मार्ग से घटनास्थल के नजदीक पहुंचेगी, जहां विशेषज्ञों की टीम नदी में उतरकर रेस्क्यू अभियान चलाएगी। उपचार के बाद स्वस्थ डॉल्फिन को फिर से उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया जाएगा।
इस पूरी व्यवस्था में स्थानीय समुदाय की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है। नदी किनारे रहने वाले ग्रामीण, मछुआरे, नाविक, गंगा प्रहरी, स्वयंसेवी संगठन और वन विभाग की टीमें किसी भी आपात स्थिति की सूचना तुरंत कंट्रोल रूम या संबंधित विभाग को देंगी। इसके बाद विशेषज्ञों की टीम के साथ डॉल्फिन एंबुलेंस मौके पर रवाना होगी। इस पहल को ‘डॉल्फिन के लिए 108 सेवा’ के रूप में देखा जा रहा है, जिससे रेस्क्यू की गति और सफलता दर बढ़ने की उम्मीद है।
केंद्रीय मंत्री सी.आर. पाटिल ने कहा कि गंगा डॉल्फिन नदी के स्वास्थ्य की पहचान है। डॉल्फिन की उपस्थिति यह दर्शाती है कि नदी का इकोसिस्टम संतुलित और मजबूत है। उन्होंने कहा कि यह पहल गंगा संरक्षण को केवल स्वच्छता तक सीमित न रखकर जलीय जीवों की सुरक्षा तक विस्तार देती है।
डब्ल्यूआईआई के वैज्ञानिकों के अनुसार, डॉल्फिन एंबुलेंस जैसी व्यवस्था से संरक्षण कार्यों को वैज्ञानिक आधार मिलेगा और डॉल्फिन की मृत्यु दर में कमी आएगी। यह पहल गंगा को एक जीवित और संवेदनशील इकोसिस्टम के रूप में संरक्षित करने का संदेश भी देती है।
गंगा डॉल्फिन भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव है और इसे नदी की सेहत का प्रमुख संकेतक माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जहां डॉल्फिन सुरक्षित रहती हैं, वहां जल गुणवत्ता और पारिस्थितिकी संतुलन बेहतर होता है। डब्ल्यूआईआई के सर्वे के अनुसार देश में करीब 6,300 से अधिक गंगा डॉल्फिन पाई जाती हैं, जिनमें सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश में है। उत्तराखंड में इनकी संख्या कम है, लेकिन पारिस्थितिकी संतुलन के लिहाज से यह क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। बिजनौर से नरौरा तक गंगा का मध्य प्रवाह डॉल्फिन का प्रमुख आवास क्षेत्र है, जहां इनकी संख्या लगभग 52 बताई गई है।
