देहरादून। परम पूज्य आर्यिका रत्न गुरुमां 105 श्री पूर्णमति माताजी के पावन सान्निध्य में श्री दिगम्बर जैन पंचायती मंदिर एवं जैन भवन, देहरादून में धार्मिक एवं आध्यात्मिक वातावरण के बीच श्रद्धापूर्वक धर्मसभा का आयोजन किया गया। नेमीनाथ परिवार एवं विद्या सिंधु बालिका मंडल की ओर से परम पूज्य आचार्य श्री की पूजा-अर्चना विधि-विधान एवं भक्तिभाव से की गई।
सकल दिगम्बर जैन समाज, देहरादून के सहयोग से श्री नेमी कुमार परिवार, श्रीकृष्ण परिवार एवं श्री बलराम परिवार बनने का परम सौभाग्य प्राप्त करने वाले तीनों परिवारों की धर्मभावना एवं पुण्य कार्य की अनुमोदना की गई। इस अवसर पर वीर विद्या युवा मंडल की ओर से तीनों परिवारों का सम्मान भी किया गया।
धर्मसभा का शुभारंभ आर्यिका रत्न श्री पूर्णमति माताजी द्वारा णमोकार मंत्र के शुद्ध उच्चारण के साथ हुआ। धर्मसभा को संबोधित करते हुए माताजी ने कहा कि मनुष्य जीवन में अनेक धार्मिक क्रियाएं करता है, पूजा-पाठ करता है, दान-पुण्य करता है, फिर भी उसके भीतर शांति क्यों नहीं आती—इस प्रश्न पर आत्मचिंतन आवश्यक है। जब तक जीव के भीतर यह मिथ्या धारणा बनी रहेगी कि “मैं पर का कर्ता हूं और पर मेरा कर्ता है”, तब तक वास्तविक आत्मिक शांति प्राप्त नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा कि स्वयं को अच्छे अथवा बुरे कर्मों का कर्ता मानना अज्ञानता है। कोई भी जीव दूसरे के सुख-दुःख का कर्ता नहीं है। प्रत्येक जीव अपने भावों का स्वयं कर्ता है। कार्य का परिणाम परिस्थितियों, समय और कर्मानुसार सामने आता है, लेकिन भावों का फल जीव को स्वयं भोगना पड़ता है।
माताजी ने उदाहरण देते हुए कहा कि एक चिकित्सक मरीज को बचाने के लिए पूरी शक्ति लगा देता है, फिर भी कभी मरीज की मृत्यु हो जाती है। वहीं कोई अपराधी किसी व्यक्ति को मारने का प्रयास करता है, लेकिन वह व्यक्ति बच जाता है। ऐसी स्थिति में केवल बाहरी क्रिया को देखकर परिणाम का निर्धारण नहीं किया जा सकता। फल भावों का मिलता है, इसलिए अपने परिणामों अर्थात मनोभावों को संभालना अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अनादि काल से मोह की परतें जीवात्मा पर चढ़ती चली आ रही हैं। बाहरी परिस्थितियों और क्रियाओं को लेकर दूसरों पर दोषारोपण करने के बजाय मनुष्य को अपने भीतर झांकना चाहिए। काँच के महल में अपने ही प्रतिबिंब से लड़ते कुत्ते और सिंह का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि जीव भी अपने ही विभावों के कारण दूसरों को दोष देता रहता है और अंततः स्वयं ही दुःखी होता है।
बंदर के घड़े में चने पकड़कर मुट्ठी न खोल पाने के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने कहा कि अज्ञानवश जीव संसार के विषयों और मोह को पकड़े रहता है और फिर उसे लगता है कि संसार ने उसे पकड़ रखा है। वास्तव में बंधन बाहर नहीं, बल्कि जीव के अपने मोह और परिणामों में है।
आर्यिका माताजी ने कहा कि थोड़ा-सा पुण्य कार्य करने के बाद भी मनुष्य अहंकार करने लगता है—“मैंने इतना दान दिया, मैंने इतना पुण्य किया।” जबकि धन-दौलत स्थायी रूप से किसी की नहीं है। जीव के पास केवल उसके भाव हैं। इसलिए पुण्य किया है तो उसकी महिमा करने के बजाय सहज रहना चाहिए और यदि पाप हुआ है तो प्रायश्चित करते हुए अपने परिणामों को सुधारने का प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कर्तृत्व भाव की जड़ें काटना ही धर्म की सच्ची साधना है। प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन स्वयं से पूछना चाहिए कि मेरा जीवन किस दिशा में जा रहा है, मैं भीतर से कहां खड़ा हूं और मेरे परिणाम कैसे हैं। संसार के कार्यों के लिए समय निकालने वाला मनुष्य यदि अपनी आत्मा के लिए समय निकाल ले तो उसके जीवन में निश्चित रूप से परिवर्तन आएगा।
माताजी ने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा, “अपनी दुकान बाद में खोलना, पहले दो कान खोलकर आत्मा के गीत सुन लो। संसार की दौड़ में बहुत भाग लिए, अब थोड़ी देर रुककर अपने भीतर देखो।” उन्होंने कहा कि विभावों से दूर होने की कला सीखना और अपने वास्तविक स्वभाव को पहचानना ही आत्मकल्याण का मार्ग है। कर्तृत्व की भूल छोड़कर आत्मा की ओर लौटना ही धर्म की सच्ची साधना है।
निरंतर चल रहे धार्मिक आयोजन
कार्यक्रम की जानकारी देते हुए मीडिया समन्वयक मधु जैन ने बताया कि 31 अगस्त को जैन मिलन पद्मावती द्वारा आचार्य श्री का पूजन किया जाएगा। इसके साथ ही प्रतिदिन माताजी की आहारचर्या, नित्य सामायिक, नित्य पाठशाला, सायंकालीन महाआरती, शंका-समाधान सहित विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम निरंतर आयोजित किए जा रहे हैं।
धर्मसभा में वीर विद्या युवा मंडल, श्री विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति एवं सकल दिगम्बर जैन समाज, देहरादून के अनेक सदस्य, पदाधिकारी एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। पूरे परिसर में भक्ति, साधना और आत्मचिंतन का वातावरण बना रहा।













