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उत्तराखंड

यूजीसी के नए इक्विटी नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, डॉ. अनिल दीक्षित ने फैसले का किया स्वागत

 

देहरादून। सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए इक्विटी रेगुलेशन–2026 पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगले आदेश तक वर्ष 2012 के नियम ही लागू रहेंगे। कोर्ट के इस आदेश से देशभर के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में लागू होने वाला नया ढांचा फिलहाल स्थगित हो गया है।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने नए नियमों की भाषा, स्पष्टता और संभावित सामाजिक प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि नियमों में अस्पष्टता है और इनके दुरुपयोग की आशंका से सामाजिक विभाजन को बढ़ावा मिल सकता है। इस प्रकरण में अगली सुनवाई की तिथि 19 मार्च तय की गई है। साथ ही केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर नियमों के औचित्य और मंशा पर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए गए हैं।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए शिक्षाविद् डॉ. अनिल दीक्षित ने अदालत के आदेश का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि न्यायालय ने बेहद संवेदनशील मुद्दे पर संतुलित और दूरदर्शी रुख अपनाया है। डॉ. दीक्षित के अनुसार, सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या ऐसे प्रावधान वास्तव में सामाजिक समरसता को मजबूत करेंगे या फिर आपसी वैमनस्य को जन्म दे सकते हैं।

अदालत ने सुझाव दिया कि इक्विटी रेगुलेशन–2026 की संवैधानिक कसौटी पर गहन समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति गठित की जानी चाहिए, ताकि नियमों की भाषा और प्रावधानों को अधिक संतुलित, स्पष्ट और सर्वसमावेशी बनाया जा सके।

2012 और 2026 के नियमों में अंतर

वर्ष 2012 के नियमों के अंतर्गत भेदभाव-निरोध की व्यवस्था मुख्य रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति तक सीमित थी। वहीं, 2026 के नए इक्विटी रेगुलेशन में पिछड़ा वर्ग को भी शामिल करते हुए प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान में इक्विटी कमेटी और इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर को अनिवार्य करने का प्रावधान किया गया था।

इन्हीं प्रावधानों को लेकर देशभर में विवाद गहराया। सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों का कहना है कि नए नियम एकतरफा सुरक्षा कवच बन सकते हैं, जिससे समान अवसर और निष्पक्षता के सिद्धांत प्रभावित होने की आशंका है।

गौरतलब है कि देश के कई शहरों में 2026 के नियमों के विरोध में छात्र आंदोलनों ने जोर पकड़ लिया है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि इन नियमों को या तो वापस लिया जाए या फिर सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित और स्पष्ट रूप से पुनः तैयार किया जाए।

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