देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा मेहरा दसौनी ने सितारगंज तहसील में विजिलेंस और राजस्व विभाग के बीच उत्पन्न विवाद को धामी सरकार की प्रशासनिक विफलता और समन्वयहीनता का गंभीर उदाहरण बताते हुए मुख्यमंत्री से पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
गुरुवार को जारी बयान में गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि सितारगंज में सामने आए घटनाक्रम ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने कहा कि एक ओर विजिलेंस विभाग संग्रह अमीन और वरिष्ठ सहायक को रिश्वत लेने के आरोप में गिरफ्तार कर रहा है, जबकि दूसरी ओर राजस्व विभाग इस कार्रवाई का विरोध करते हुए दावा कर रहा है कि संबंधित धनराशि सरकारी राजस्व और केसीसी ऋण की वैध वसूली थी।
उन्होंने कहा कि जब सरकार के दो विभाग एक-दूसरे के दावों को ही कटघरे में खड़ा कर रहे हों, तो सबसे बड़ा प्रश्न मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से है कि आखिर सच किसके साथ है और सरकार किस पक्ष पर भरोसा कर रही है।
कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता ने कहा कि मुख्यमंत्री धामी लगातार भ्रष्टाचार के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” की बात करते हैं, लेकिन वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि सरकार के अपने विभाग ही एक-दूसरे की कार्रवाई पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। उनके अनुसार यह “जीरो टॉलरेंस” नहीं, बल्कि “जीरो गवर्नेंस” का प्रमाण है।
गरिमा मेहरा दसौनी ने कहा कि यदि विजिलेंस की कार्रवाई सही है तो सरकार को यह बताना चाहिए कि उसके विभागों में भ्रष्टाचार इस स्तर तक कैसे पहुंचा। वहीं यदि राजस्व विभाग का दावा सही है तो कथित रूप से निर्दोष कर्मचारियों को फंसाने की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह मामला केवल दो कर्मचारियों की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है, बल्कि धामी सरकार की प्रशासनिक कार्यशैली, विभागीय समन्वय और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करता है। ऐसी परिस्थितियों में शासन-प्रशासन के प्रति जनता का विश्वास प्रभावित होना स्वाभाविक है।
मुख्य प्रवक्ता ने कहा कि कांग्रेस का स्पष्ट मत है कि भ्रष्टाचार में लिप्त किसी भी व्यक्ति को संरक्षण नहीं मिलना चाहिए, लेकिन यदि किसी सरकारी कर्मचारी के साथ अन्याय हुआ है या उसे बिना पर्याप्त आधार के फंसाया गया है तो दोषी अधिकारियों के विरुद्ध भी समान रूप से कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
गरिमा मेहरा दसौनी ने पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय, स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं समयबद्ध जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि उत्तराखंड की जनता को नारों और प्रचार नहीं, बल्कि पारदर्शी, जवाबदेह और विश्वसनीय शासन की आवश्यकता है। उन्होंने मुख्यमंत्री से तत्काल पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करने और यह बताने की मांग की कि सरकार के दो विभागों के परस्पर विरोधी दावों में आखिर सत्य किसके साथ है।









