*देहरादून।* धर्मनगरी देहरादून में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण की दिव्य कथा के क्रम में आज ध्रुव चरित्र और जड़ भरत चरित्र का भावपूर्ण वर्णन किया गया। पूज्य व्यासपीठ से आचार्य शशिकांत जी ने इन दो महान विभूतियों की प्रेरक जीवनगाथाओं को भक्तों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए बताया कि ये प्रसंग भक्ति, वैराग्य और आत्मज्ञान का अद्भुत संगम हैं।
कथा के दौरान श्रद्धालुओं से खचाखच भरे पंडाल में आचार्य शशिकांत जी ने समझाया कि कैसे मात्र पाँच वर्ष की आयु में ध्रुव जी ने अपने आत्मसम्मान और अटूट भक्ति के बल पर घोर वन में जाकर कठोर तपस्या की। उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने उन्हें अचल और अमर ध्रुवलोक प्रदान किया। इस कथा ने यह सशक्त संदेश दिया कि सच्ची निष्ठा और पवित्र भक्ति से ईश्वर की कृपा अवश्य मिलती है, और व्यक्ति को अपने लक्ष्य में अडिग रहना चाहिए।
इसके पश्चात्, आचार्य जी ने जड़ भरत चरित्र का विस्तृत वर्णन किया, जिसे वैराग्य और आत्मज्ञान की पराकाष्ठा बताया गया। उन्होंने बताया कि राजा भरत, जो अपने पूर्व जन्म में एक श्रेष्ठ राजा थे, अगले जन्म में संसार के मोह से विरक्त होकर जड़ भरत के रूप में अवतरित हुए। उनका बाह्य स्वरूप भले ही सामान्य प्रतीत होता था, परंतु वे भीतर से परम ज्ञानी थे। राजा रहूगण को दिए गए उनके आत्मज्ञान के उपदेश ने स्पष्ट किया कि सत्य का बोध बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अंतरात्मा की निर्मलता से होता है।
इन दोनों अलौकिक प्रसंगों ने श्रोताओं को यह महत्वपूर्ण संदेश दिया कि जीवन में भक्ति से ईश्वर की प्राप्ति, वैराग्य से आंतरिक शांति और आत्मज्ञान से परम मोक्ष संभव है। कथा स्थल पर भक्तों की अपार भीड़ देखने को मिली, और पूरा वातावरण बार-बार गूंज रहे “नारायण-नारायण” के उद्घोष से भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने भाव-विभोर होकर कथा का श्रवण किया और अपने जीवन में इन दिव्य शिक्षाओं को उतारने का संकल्प लिया।
