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गुलदार–भालू–हाथियों का हमला तेज, 2025 में रिकॉर्ड मौतें; पहाड़ों–मैदानों में दहशत

By: Naveen Joshi

On: Sunday, December 7, 2025 5:18 PM

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देहरादून। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर रूप लेता जा रहा है। पहाड़ों में गुलदार और भालू, जबकि तराई-मैदानी इलाकों में हाथी आमजन की जान के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। राज्य गठन के बाद पिछले 25 वर्षों के आंकड़े स्थिति की भयावहता को उजागर करते हैं, वहीं वर्ष 2025 में सामने आए मामले लोगों में और अधिक दहशत फैला रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग वन विभाग और वन मंत्री की कार्यशैली को खुलकर कठघरे में खड़ा कर रहे हैं।

गांवों में सूरज ढलते ही कर्फ्यू जैसा माहौल, राज्य के कई पहाड़ी गांवों में सूर्यास्त के बाद लोगों का घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। जंगल से सटे इलाकों में रोजाना वन्यजीव हमलों की खबरें सामने आ रही हैं। रामनगर क्षेत्र में हाल ही में एक व्यक्ति पर भालू ने हमला कर दिया, हालांकि वह बहादुरी दिखाते हुए मौत के मुंह से बाहर निकल आया। उसकी आपबीती सुनकर क्षेत्र के लोग दहशत में हैं।

25 वर्षों में 1264 मौतें, 6519 घायल, आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो दशकों में जंगली जानवरों के हमलों में 1264 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 6519 लोग घायल हुए हैं। केवल वर्ष 2025 की बात करें, तो इस साल वन्यजीव हमलों में 64 लोगों की जान जा चुकी है, जो इस संघर्ष की भयावहता को दर्शाता है।

भालुओं का बढ़ता आतंक, इस वर्ष राज्य में भालू के हमलों के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। अब तक 9 लोगों की मौत और 25 लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं। इस मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सरकार और वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है।

विधानसभा से लेकर संसद तक गूंजा मुद्दा, बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का मामला अब केवल राज्य की सीमाओं तक सीमित नहीं है। राज्यसभा में महेंद्र भट्ट और लोकसभा में अनिल बलूनी ने इस विषय को मजबूती से उठाया, जिससे इसकी गंभीरता का राष्ट्रीय स्तर पर भी संज्ञान लिया गया है।

65% वन क्षेत्र वाला राज्य, फिर भी वन विभाग कटघरे में, उत्तराखंड का लगभग 65 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है और वन विभाग में पर्याप्त संख्या में अधिकारी तैनात हैं। इसके बावजूद वन्यजीव हमलों में कमी नहीं आ रही है। जनता का आरोप है कि विभाग की लापरवाही और केवल बयानबाजी की राजनीति ने हालात को और अधिक चिंताजनक बना दिया है।

जनता का सवाल है — कब रुकेगा यह खून-खराबा? कब जागेगा वन विभाग? और कब खत्म होंगे ये कर्फ्यू जैसे हालात?

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