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जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए एकीकृत प्रयासों की जरूरत

देहरादून। भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के तत्वावधान में “सतत वन-आधारित जैव-अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने: मुद्दे और चुनौतियाँ” विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला का सफल समापन हुआ। इस महत्वपूर्ण आयोजन में नीति-निर्माताओं, वैज्ञानिकों, उद्योग प्रतिनिधियों तथा विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने भाग लेकर गहन विचार-विमर्श किया।

कार्यशाला का उद्घाटन केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने शनिवार को किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि प्रकृति सर्वोपरि है और मानव अस्तित्व के लिए उसके साथ संतुलित सह-अस्तित्व आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वन संरक्षण का दायरा केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का संरक्षण शामिल है।

कार्यशाला के दौरान चार प्रमुख विषयों पर व्यापक चर्चा की गई, जिनमें सतत संसाधन-आधारित जैव-अर्थव्यवस्था एवं सामुदायिक एकीकरण, वन-आधारित उद्योग और उभरते जैव-आधारित उत्पाद, जलवायु परिवर्तन शमन में वन जैव-अर्थव्यवस्था की भूमिका तथा वन एवं वन्यजीव-आधारित आजीविका के आयाम शामिल रहे।

विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय वानिकी कार्यक्रमों में उपग्रह-आधारित वन निगरानी प्रणालियों को शामिल करने पर विशेष बल दिया। उनका मानना है कि रिमोट सेंसिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं मशीन लर्निंग तकनीकों तथा जमीनी आंकड़ों के समन्वय से एक सशक्त भू-स्थानिक ढांचा विकसित किया जा सकता है, जिससे वास्तविक समय में साक्ष्य-आधारित निर्णय लेना संभव होगा। इससे निगरानी, पारदर्शिता और अनुकूलनीय प्रबंधन को भी मजबूती मिलेगी।

इसके साथ ही, कार्यशाला में समुदाय-आधारित संरक्षण मॉडल को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने इको-टूरिज्म, प्रकृति-आधारित उद्यम तथा वन्यजीव-अनुकूल कृषि जैसे आजीविका विकल्पों को प्रोत्साहित करने की सिफारिश की, जिससे स्थानीय समुदायों की आय में वृद्धि के साथ-साथ मानव-वन्यजीव संघर्षों में कमी लाई जा सके।

कार्यशाला का समापन इस सहमति के साथ हुआ कि सतत वन-आधारित जैव-अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी, संस्थागत समन्वय और सामुदायिक सहभागिता के स्तर पर समेकित प्रयास आवश्यक हैं।

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