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मोरारी बापू की 962वीं रामकथा का आरंभ पोलैंड से

 

नई दिल्ली ,  यहूदियों पर हुए नरसंहार और अमानवीय क्रूरता से ग्रसित भूमि की शांति के लिए कथा क्रमांक-962 “मानस वैराग्य” का शुभारंभ आज पोलैंड के केटोवीसा से मोरारी बापू ने किया। कथा का स्वागत लंदन निवासी शितुल जी और रमाबहन पंचमयता परिवार ने सरल किन्तु भावनापूर्ण शब्दों में किया।

कथा की शुरुआत बापू ने रामचरितमानस की पंक्तियों से की— “सहज बिराग रूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।। (बालकांड)” और “कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिध्धि तीनि त्यागी।। (अरण्यकांड)”। उन्होंने कहा कि श्री हनुमानजी वैराग्य के घनीभूत स्वरूप हैं। राम सत्य का, शिव विश्वास का और श्रीकृष्ण प्रेम का घनीभूत स्वरूप हैं।

बापू ने स्पष्ट किया कि वैराग्य का अर्थ विलासिता से भागना नहीं है, बल्कि जीवन को इतनी ऊंचाई तक ले जाना है कि उसमें विलासिता प्रवेश ही न कर सके। उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि महापुरुषों ने क्षण भर में त्याग कर वैराग्य का आदर्श प्रस्तुत किया है।

कथा के दौरान बापू ने जनकपुरी की रमणीयता, विश्वामित्र के यज्ञ, अहल्या उद्धार और गंगा तट के प्रसंगों का वर्णन किया। उन्होंने जनकपुरी के विलास को नगर निर्माण की प्रेरणा बताया। साथ ही पंचवटी में भगवान राम द्वारा लक्ष्मण को ज्ञान, वैराग्य, माया, भक्ति और जीव-ईश्वर भेद पर दिए गए उत्तरों को विस्तार से समझाया।

उन्होंने कहा कि जहां अभिमान न हो, वही ज्ञान है। जो तिनके समान सभी सिद्धियों का त्याग कर दे, वही परम विरागी है। त्याग से शांति और वैराग्य से शांतिनाथ—भगवान राम—प्राप्त होते हैं।

इस अवसर पर बापू ने उल्लेख किया कि यहां से मात्र 35 किलोमीटर दूर ऑशविट्ज़-बिरकेनाउ में लाखों यहूदियों की हत्या की गई थी। इस भूमि पर कथा आरंभ करते हुए उन्होंने प्रार्थना की कि पूरी दुनिया में शांति स्थापित हो।

ग्रंथ परिचय देते हुए उन्होंने कहा कि—

बालकांड तप प्रधान है,

अयोध्या कांड त्याग प्रधान है,

अरण्यकांड पतिव्रत धर्म प्रधान है,

किष्किंधा कांड तृषा प्रधान है,

सुंदरकांड तरण प्रधान है,

लंका कांड तारण प्रधान है,

और उत्तरकांड तृप्ति प्रधान है।

पहले दिन की कथा का समापन बापू ने वाणी, विनायक, गुरु और हनुमानजी की वंदना के साथ किया।

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