देहरादून, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के उत्तराखंड प्रवास के द्वितीय दिवस पर निम्बूवाला हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र, में पूर्व सैनिकों एवं पूर्व सेना अधिकारियों के साथ “प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद कार्यक्रम” का आयोजन सम्पन्न हुआ।
कार्यक्रम के प्रारंभ में पूर्व मेजर जनरल गुलाब सिंह रावत, कर्नल अजय कोठियाल एवं कर्नल मयंक चौबे ने सरसंघचालक का शाल ओढ़ाकर एवं पारंपरिक टोपी पहनाकर सम्मानपूर्वक स्वागत किया। कार्यक्रम में सेना का नेतृत्व कर चुके सेवानिवृत्त छह जनरल, एक वाइस एडमिरल, डीजी कॉस्ट गार्ड, ब्रिगेडियर एवं 50 से अधिक कर्नल रैंक के अधिकारी उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त कप्तान एवं हवलदार रैंक के सैकड़ों पूर्व सैनिक सैन्य परिधान में उत्साहपूर्वक सम्मिलित हुए। मंच संचालन श्री राजेश सेठी ने किया।
अपने प्रमुख उद्बोधन में डॉ. भागवत ने कहा कि राष्ट्र के भाग्य निर्माण में समाज की केंद्रीय भूमिका होती है। उन्होंने स्पष्ट कहा, “समाज मजबूत होगा तो राष्ट्र की रक्षा भी सशक्त होगी।” उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर विभिन्न क्रांतिकारी आंदोलनों की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता की चेतना कभी समाप्त नहीं हुई। द्वितीय विश्वयुद्ध के संदर्भ में विंस्टन चर्चिल का उल्लेख करते हुए उन्होंने इतिहास से सीख लेने को परिपक्व राष्ट्रीय चेतना का लक्षण बताया।
संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि वे जन्मजात राष्ट्रभक्त थे और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही। उनके संपर्क में मदन मोहन मालवीय सहित अनेक स्वतंत्रता सेनानी रहे। डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, चुनावी राजनीति नहीं। उन्होंने कहा कि बिना बाह्य संसाधनों के संघ खड़ा हुआ और दो बार प्रतिबंध झेलने के बाद भी समाज की आत्मशक्ति के बल पर निरंतर आगे बढ़ता रहा।
जिज्ञासा संवाद सत्र
द्वितीय सत्र में पूर्व सैनिकों एवं अधिकारियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता, युवा पीढ़ी एवं नीतिगत विषयों पर प्रश्न रखे। अग्निवीर योजना पर उन्होंने इसे एक प्रयोग बताते हुए अनुभव के आधार पर आवश्यक सुधार की संभावनाओं पर विचार करने की बात कही।
नेपाल, बांग्लादेश एवं कश्मीर के संदर्भ में उन्होंने कहा कि ये ऐतिहासिक रूप से एक सांस्कृतिक भू-भाग के अंग रहे हैं। कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते हुए उन्होंने राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के प्रति दृढ़ नीति की आवश्यकता पर बल दिया।
हिंदू पहचान और सामाजिक समरसता पर उन्होंने “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना को भारतीय दृष्टि का मूल बताया। मंदिर, जल स्रोत और श्मशान जैसे सार्वजनिक संसाधनों को सभी के लिए समान रूप से खुले होने की आवश्यकता पर बल दिया।
सोशल मीडिया पर बढ़ती वैचारिक कटुता पर उन्होंने संवाद और शास्त्रार्थ की परंपरा को पुनर्जीवित करने का आह्वान किया। भ्रष्टाचार को “नियत” की समस्या बताते हुए उन्होंने चरित्र निर्माण, संस्कार एवं परोपकार की भावना को राष्ट्र निर्माण का आधार कहा।
गढ़वाल सहित पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन रोकने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य एवं स्थानीय उद्यमिता को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता बताई। समान नागरिक संहिता (UCC) को राष्ट्रीय एकात्मता का साधन बताते हुए उन्होंने सामाजिक सहमति की आवश्यकता पर बल दिया।
पूर्व सैनिकों से आह्वान करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि सीमाओं की रक्षा के साथ समाज के भीतर भी सेवा की आवश्यकता है। उन्होंने संघ के देशभर में संचालित 1 लाख 30 हजार से अधिक सेवा प्रकल्पों से जुड़ने का आग्रह किया और शताब्दी वर्ष में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया।
कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गीत के ओजस्वी गायन के साथ हुआ।
