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विश्व की आशा भारत से, व्यक्ति निर्माण ही संघ का लक्ष्य : मोहन भागवत

By: Naveen Joshi

On: Sunday, February 22, 2026 8:09 PM

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देहरादून,  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में “संघ यात्रा – नये क्षितिज, नये आयाम” विषय पर प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद का आयोजन देहरादून स्थित हिमालयन कल्चरल सेंटर के सभागार में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ सरसंघचालक द्वारा भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पण एवं सामूहिक वंदेमातरम् गायन से हुआ। संचालन विभाग प्रचार प्रमुख गजेन्द्र खंडूड़ी ने किया। प्रांत कार्यवाह दिनेश सेमवाल ने शताब्दी वर्ष के अंतर्गत उत्तराखंड में आयोजित पथ संचलन, घोष संचलन, व्यापक गृह संपर्क अभियान, परिवार संपर्क एवं हिंदू सम्मेलनों की जानकारी देते हुए आगामी योजनाओं का भी उल्लेख किया।

ऊपर से जो दिखता है, वह सदैव सत्य नहीं”

अपने उद्बोधन में मोहन भागवत ने कहा कि संघ को बाहरी रूप से देखकर उसकी वास्तविकता को नहीं समझा जा सकता। पथ संचलन देखकर कुछ लोग उसे अर्धसैनिक संगठन समझ लेते हैं, राष्ट्रप्रेम के गीतों के आधार पर संगीत मंडली और सेवा कार्यों के आधार पर सेवा संगठन मान लेते हैं, जबकि संघ इन सीमाओं से परे व्यापक सामाजिक शक्ति है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे चीनी की मिठास को जानने के लिए उसे चखना पड़ता है, वैसे ही संघ को समझने के लिए उसके कार्य में प्रत्यक्ष आना आवश्यक है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का किसी संगठन से प्रतिस्पर्धा नहीं है। राष्ट्र सशक्त होगा तो नागरिक भी सुरक्षित और सशक्त होंगे। संघ का मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, क्योंकि सशक्त व्यक्ति से ही सशक्त समाज और राष्ट्र का निर्माण संभव है।

डॉ. हेडगेवार के जीवन प्रसंग

संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि वे जन्मजात देशभक्त और विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। बाल्यकाल में महारानी विक्टोरिया के जन्मदिवस पर विद्यालय में वितरित मिठाई लेने से उन्होंने यह कहकर इंकार किया कि वे अपने देश पर शासन करने वाले के उत्सव में भाग नहीं लेंगे।

वे अनुशीलन समिति से जुड़े रहे तथा वंदेमातरम् गान के कारण अंग्रेजों द्वारा देशद्रोह का मुकदमा भी झेला। भारत को पुनः पराधीनता से बचाने के संकल्प के साथ उन्होंने संघ की स्थापना की।

विश्व की आशा भारत से”

भागवत ने कहा कि लंबी ऐतिहासिक यात्रा के बाद आज विश्व भारत को नेतृत्वकारी भूमिका में देख रहा है। उन्होंने उपस्थित जनसमूह से संघ की गतिविधियों से जुड़कर समाज और राष्ट्र को सशक्त बनाने का आह्वान किया तथा “पंच परिवर्तन” के माध्यम से भारत को परम वैभव तक ले जाने का संकल्प लेने की अपील की।

भेदभाव और सामाजिक परिवर्तन:

उन्होंने कहा कि सामाजिक कुरीतियों और भेदभाव का मूल कारण व्यवस्था नहीं, बल्कि मन है। अंधकार को समाप्त करने के लिए प्रकाश जलाना पड़ता है। व्यवहार परिवर्तन से ही सामाजिक समरसता स्थापित होगी।

तकनीक और संस्कार:

डिजिटल युग में तकनीक को साधन बताते हुए उन्होंने कहा कि उसका उपयोग संयम और अनुशासन के साथ होना चाहिए। परिवार में संवाद और आत्मीयता आवश्यक है।

सांस्कृतिक पहचान और शक्ति:

उन्होंने कहा कि जो समाज को जोड़ने का कार्य करे वही हिंदू है। विश्व शक्ति को समझता है, इसलिए शक्ति अर्जित करना आवश्यक है, किंतु उसका उपयोग मर्यादित होना चाहिए।

महिलाओं की भूमिका:

भागवत ने कहा कि महिलाएं पूर्णतः सक्षम और स्वतंत्र हैं। देश संचालन में उनकी भागीदारी 33 प्रतिशत ही नहीं, 50 प्रतिशत तक होनी चाहिए।

पर्यावरण, शिक्षा और सामाजिक सद्भाव:

उत्तराखंड की नदियों और पर्यावरण संरक्षण के लिए समन्वित नीति एवं स्थानीय सहभागिता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा में पाठ्यक्रम से अधिक शिक्षक के संस्कार महत्वपूर्ण हैं। आरक्षण, वर्गीकरण एवं समान नागरिक संहिता जैसे विषयों पर समाज को सद्भाव और प्रमाणिकता के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

राजनीति और जनसंख्या:

उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ हिंदुत्व की राजनीति नहीं करता, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज उत्थान का कार्य करता है। भ्रष्टाचार मन से प्रारंभ होता है और वहीं समाप्त किया जा सकता है। जनसंख्या को संसाधन और चुनौती—दोनों दृष्टियों से देखने की आवश्यकता बताते हुए उन्होंने संतुलित एवं समान नीति की वकालत की।

कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों के प्रबुद्धजन, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षाविद्, उद्योग जगत से जुड़े प्रतिनिधि एवं बड़ी संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित रहे। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

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