पूजा, दान और आत्मशुद्धि का महापर्व; मांगलिक कार्य रहेंगे वर्जित
देहरादून। सनातन धर्म में अत्यंत पुण्यदायी, कल्याणकारी और आध्यात्मिक साधना के लिए समर्पित पुरुषोत्तम मास इस वर्ष 17 मई 2026 (रविवार) से प्रारंभ होकर 15 जून 2026 (सोमवार) तक रहेगा। धर्मशास्त्रों में इसे अधिक मास अथवा मलमास भी कहा गया है। इस वर्ष यह पावन मास ज्येष्ठ माह में पड़ रहा है, जिसके कारण ज्येष्ठ मास दो माह का होगा।
देहरादून, के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य एवं धर्माचार्य पं. चंद्रशेखर जोशी ने बताया कि पुरुषोत्तम मास भगवान श्रीहरि विष्णु की आराधना, तप, जप, दान, व्रत और आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ काल माना जाता है। इस माह में श्रद्धा और भक्ति से किए गए धार्मिक कार्यों का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक प्राप्त होता है।
उन्होंने बताया कि ज्योतिषीय गणना के अनुसार जिस मास में सूर्य की संक्रांति नहीं होती, उसे अधिक मास कहा जाता है। सरल शब्दों में, एक अमावस्या से दूसरी अमावस्या के बीच यदि सूर्य किसी नई राशि में प्रवेश नहीं करता, तो वह काल अधिक मास कहलाता है। सूर्य और चंद्रमा की गति में अंतर होने के कारण लगभग प्रत्येक तीन वर्ष में यह अतिरिक्त मास आता है, जिससे सौर और चंद्र गणना का संतुलन बना रहता है।
पुरुषोत्तम मास में करें भगवान विष्णु की आराधना
पं. जोशी ने बताया कि इस पूरे माह भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना करनी चाहिए। प्रतिदिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप अत्यंत फलदायी माना गया है। विष्णु सहस्रनाम, पुरुष सूक्त तथा श्रीहरि स्तुति का पाठ करने से मन को शांति और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।
दान-पुण्य और सेवा का विशेष महत्व
धर्मग्रंथों में पुरुषोत्तम मास में दान-पुण्य को अत्यंत शुभ बताया गया है। घी, गुड़, अनाज, वस्त्र तथा तांबे के पात्रों का दान विशेष पुण्यदायी माना गया है। निर्धनों, असहायों और जरूरतमंदों की सहायता करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
दीपदान, स्नान और धार्मिक पाठ का पुण्य
शाम के समय तुलसी के समीप, मंदिरों में अथवा पवित्र नदी तट पर दीपदान करने का विशेष महत्व बताया गया है। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व स्नान तथा गंगाजल मिश्रित जल से स्नान को भी पुण्यकारी माना गया है।
इस माह श्रीमद्भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत कथा और रामचरितमानस का पाठ एवं श्रवण विशेष फलदायी माना गया है। सात्विक भोजन, संयमित जीवनचर्या और सकारात्मक विचारों को पुरुषोत्तम मास की सबसे बड़ी साधना बताया गया है।
पुरुषोत्तम मास में न करें ये कार्य
धर्माचार्यों के अनुसार इस माह विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने गए हैं। नया व्यवसाय आरंभ करना, वाहन या भवन खरीदना भी शुभ नहीं माना जाता।
इसके अतिरिक्त मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से बचने की सलाह दी गई है। क्रोध, विवाद, झूठ, निंदा और अहंकार से दूर रहकर सादगीपूर्ण जीवन अपनाना इस माह का मुख्य संदेश माना गया है।
पुराणों में वर्णित है पुरुषोत्तम मास की महिमा
पौराणिक कथाओं के अनुसार अधिक मास का कोई स्वामी नहीं था और लोग उसे “मलमास” कहकर तिरस्कृत करते थे। तब वह भगवान विष्णु की शरण में पहुंचा। भगवान श्रीहरि ने उसे अपना नाम और श्रेष्ठता प्रदान करते हुए कहा—
“अहमेते यथा लोके प्रथितः पुरुषोत्तमः।
तथायमपि लोकेषु प्रथितः पुरुषोत्तमः।।’’
अर्थात जिस प्रकार मैं संसार में “पुरुषोत्तम” नाम से विख्यात हूं, उसी प्रकार यह मास भी पृथ्वी पर पुरुषोत्तम मास के नाम से प्रसिद्ध होगा। तभी से अधिक मास “पुरुषोत्तम मास” कहलाया।
एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु के वध हेतु इसी विशेष काल की रचना की थी, क्योंकि उसे वरदान प्राप्त था कि वर्ष के बारह महीनों में उसका वध नहीं हो सकता।
आत्मशुद्धि और भक्ति का श्रेष्ठ अवसर
पं. चंद्रशेखर जोशी ने कहा कि पुरुषोत्तम मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि आत्ममंथन, संयम, सेवा और ईश्वर से जुड़ने का दिव्य अवसर है। इस पावन मास में प्रत्येक व्यक्ति को सत्कर्म, सेवा और भक्ति के मार्ग पर चलकर अपने जीवन को आध्यात्मिक ऊर्जा से प्रकाशित करना चाहिए।





