
देहरादून।
करवाचौथ का त्योहार महिलाओं के लिए बेहद ही खास होता है। इस मौके पर यदि अपने उत्तराखंड की संस्कृति को आगे बढ़ाने का प्रयास भी शामिल हो तो ये अवसर बेहद ही खास हो जाता है। उत्तराखंड की हँसुली संस्था कुछ ऐसा ही कर रही है। यहां महिलाओं का समूह उत्तराखंड के पारम्परिक आभूषणों को पुनर्जीवित कर रहा है। इन आभूषणों के साथ ही त्योहार को मनाने का आग्रह भी किया जा रहा है।
शनिवार को सहस्त्रधारा रोड स्थित एक सभागार में हँसुली की संस्थापक गौरी बलोदी की ओर से यहाँ पारम्परिक आभूषणों की प्रदर्शनी लगाई गई। इस मौके पर पारम्परिक वेशभूषा में सजी महिलाएं एक ओर ये ज्वैलरी बनाते हुए इनके बारे में बता रही थी तो वहीं बीच बीच मे पारम्परिक गाने भी गा रही थी। आयोजिका गौरी ने बताया कि उन्हें बचपन से ही अपनी संस्कृति से बेहद लगाव था। यही वजह थी कि जब उनकी मां पूजा तोमर ने पहाड़ी रसोई शुरू की तो वहां पहाड़ी व्यंजन बनाने से लेकर परोसने तक का काम गौरी बेहद ही लगाव से करती थी। गौरी ने बताया उसको डर था कि कहीं शादी के बाद वो इन सबसे दूर न हो जाए। वहीं गौरी को पति भी ऐसा मिल गया जो खुद उत्तराखंड की संस्कृति से बेहद लगाव रखते हैं। पति हेमंत का साथ मिला तो दोनों ने मिलकर अपने पारम्परिक आभूषणों को पुनर्जीवित करने के लिए काम किया। घंटों इस काम को देने के बाद उन्होंने इसकी मार्केटिंग पर फोकस किया और लोगो ने भी तुरंत अपना प्यार देना शुरू कर दिया। पहाड़ के ही नहीं अन्य जगहों के लोगों ने भी ये पारम्परिक ज्वैलरी खरीदी। उन्होंने बताया कि विलुप्त होते इन आभूषणों को हम फिर से महिलाओं के बीच जीवित करने के लिए पूरी मेहनत कर रहे हैं। यहां महिलाओं का समूह गुलोबन्द, चन्द्रहार, तिमानिया, तुंगल, पोची, हँसुली, नथुली, धगुली आदि आभूषण बना रहा है। जिसको उत्तराखंड सहित देश और विदेश में भी प्रचलित करना चाहते हैं ताकि आने वाली पीढ़ी भी अपनी संस्कृति से रूबरू हो सके।
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