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ज्योतिर्मठ क्षेत्र के सलुड डूंगरा गांव में लोक संस्कृति परंपरा का कुंभ विश्व सांस्कृतिक धरोहर रम्माण उत्सव शुरू

By: prabhatchingari

On: Wednesday, April 30, 2025 5:30 PM

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*ज्योतिर्मठ क्षेत्र के सलुड डूंगरा गांव में लोक संस्कृति परंपरा का कुंभ विश्व सांस्कृतिक धरोहर रम्माण उत्सव शुरू*
चमोली ( प्रदीप लखेड़ा )
ज्योतिर्मठ प्रखंड के सलूड डुंगरा की 500 वर्ष पुरानी रम्माण विरासत का सजीव मंचन आज अक्षय तृतीया पर्व पर ज्योतिर्मठ क्षेत्र के विश्व सांस्कृतिक धरोहर “रम्माण”लोक सांस्कृतिक विरासत उत्सव का आगाज मेजबान गांव सलूड डूंगरा में बड़े ही धूम धाम से हो गया है,पैन खंडा छेत्र की प्राचीन मौखोटा शैली और भलदा परम्परा और उत्तराखंड की लोक कला संस्कृति को आज भी जीवंत बनाए हुए “रम्माण उत्सव” भूमियाल चौक सलूड डुंगरा गांव में श्री राम कथा को जागर शैली में नृत्य नाटिका के माध्यम से सजीव मंचन वाला यह विश्व सांस्कृतिक विरासत लोक संस्कृती को संजोने वाला उत्सव ढोल दमों की थाप और रण सिंघे बाजा भोंकारे की गूंज के साथ शुरू हो गया है, जो आज रात परंपरा अनुसार भूम्याल मंदिर क्षेत्रपाल देवता के परिसर में 18मुखौटा की विशेष पूजा अर्चना के साथ भूमियाल देवता द्वारा सभी ग्राम वासियों को सुख समृद्धि और खुशहाली के आशीष देने के साथ सम्पन्न होगा।
अपनी अमूर्त लोक संस्कृति और परम्परा के चलते यूनेस्को की यह विश्व सांस्कृतिक धरोहर आज देश विदेश तक हर एक व्यक्ति के दिलों में रच बस गई है,इस ऐतिहासिक पौराणिक सांस्कृतिक “रम्माण”को जीवंत रखने के प्रयासों से ही वर्ष 2009में इसे यूनेस्को की विश्व सांस्कृतिक विरासत का दर्जा मिला है।
रम्माण मेला जोतिर्मठ विकास खंड के सलूड़ गांव में आयोजित होता है। सलूड़-डुंग्रा गांव में वैशाख माह में हर साल रम्माण मेला आयोजित किया जाता है। रम्माण मेला सलूड़ गांव की कई वर्षों पुरानी परंपरा है। इस उत्सव में रामायण पाठ किया जाता है, लेकिन बिना संवाद के,गीतों, ढोल व ताल पर मुखोटा शैली पर रामायण का मंचन होता है। रम्माण उत्सव का आयोजन बदरीनाथ जी के कपाट खुलने से पूर्व किया जाता है। जिसका आयोजन सलूड़-डुंग्रा की ग्राम पंचायत करती है।
भूमियाल देवता मंदिर के प्रांगण में आयोजित इस मेले में राम, लक्ष्मण, सीता व हनुमान के पात्र ढोल-दमाऊ की थाप पर नृत्य करते हैं। जिसमें राम जन्म, सीता स्वयंवर, वन प्रस्थान, सीता हरण, हनुमान मिलन, लंका दहन का वर्णन किया जाता है। रम्माण नृत्य में 18 मुखौटे, 18 ताल, 12 ढोल, 12 दमाऊं, 8 भंकोरे का प्रयोग होता है। ये मुखौटे भोजपत्र से बने होते हैं। रम्माण मेला 10 या 15 दिनों तक मनाया जाता है। रम्माण, पूजा, अनुष्ठानों की एक शृंखला है, इसमें सामूहिक पूजा, देवयात्रा, लोकनाट्य, नृत्य, गायन, मेला आदि का आयोजन होता है।

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