देहरादून, ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में जारी आपदा प्रबंधन वर्ल्ड समिट के दूसरे दिन वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, जनप्रतिनिधियों और विशेषज्ञों ने वैश्विक आपदा जोखिम को कम करने की रणनीतियों पर मंथन किया। पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने विज्ञान, परम्परागत ज्ञान और संस्कृति के समन्वित उपयोग को आपदा प्रबंधन की सबसे प्रभावी दिशा बताया।
समिट के मुख्य संयोजक व यूकोस्ट महानिदेशक डॉ. दुर्गेश पंत ने बताया कि दस तकनीकी सत्रों में एआई-एमएल आधारित तकनीकों से लेकर परम्परागत उपायों तक पर विस्तृत चर्चा हुई। हिमालयी राज्यों में बढ़ती आपदाओं की चुनौतियों को देखते हुए वैश्विक विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत शोधों ने समाधान की नई राहें दिखाई।
वाटर कनक्लेव में जल संरक्षण, सर्वेक्षण और भू-विज्ञान आधारित अध्ययनों पर विशेषज्ञों ने जोर दिया। प्रमुख सचिव डॉ. आर. मिनाक्षी सुंदरम ने टिहरी में अपने आपदा अनुभव साझा करते हुए स्थानीय समुदाय एवं पारम्परिक ज्ञान को आपदा प्रबंधन की मुख्य धुरी बताया। गूंज संस्था के प्रतिनिधियों ने भी समुदाय आधारित आपदा रणनीतियों पर बल दिया।
मीडिया की भूमिका विषयक सत्र में वरिष्ठ पत्रकारों और शोधकर्ताओं ने आपदाओं में नुकसान कम करने के व्यावहारिक उपाय सुझाए, जबकि स्पेस टू सेफ्टी संगोष्ठी में इसरो व अन्य वैज्ञानिक संस्थानों के विशेषज्ञों ने सैटेलाइट तकनीकों के उपयोग पर चर्चा की।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रदर्शनी में ड्रोन, आपदा प्रबंधन उपकरणों, औषधीय पौधों से लेकर अंतरिक्ष तकनीकों तक की नवीन खोजों का बड़ा प्रदर्शन रहा, जिसे हजारों लोगों ने देखा।
समिट में एआई-एमएल, भूक्षरण, जैव-विविधता, भीड़ प्रबंधन, जलवायु पूर्वानुमान और नवाचार आधारित आपदा समाधान जैसे विषयों पर 180 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
