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पितृऋण से विमुख हुआ मानव पतन की ओर जाता है : स्वामी रसिक महाराज

 

देहरादून। मां ज्वाल्पा देवी कीर्तन मण्डली, क्लेमनटाउन के सानिध्य में रघुनाथ मंदिर में आयोजित देवी भागवत कथा के पांचवें दिन नृसिंह पीठाधीश्वर स्वामी रसिक महाराज ने व्यासपीठ से प्रवचन देते हुए कहा कि समाज की सच्ची सेवा तभी संभव है जब हम पद पाने की अभिलाषा छोड़ दें। उन्होंने कहा कि पद बड़ा हो न हो, लेकिन व्यक्ति का कद बड़ा होना चाहिए।

स्वामी रसिक महाराज ने शास्त्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि मानव जीवन में तीन ऋण बताए गए हैं—ऋषिऋण, देवऋण और पितृऋण। पितरों के बिना सृष्टि का संचालन संभव नहीं है। संतानोत्पत्ति के पश्चात ही मनुष्य पितृऋण के शोधन का अधिकारी बनता है। अतः महालय पर्व पर श्रद्धा और भावना के साथ श्राद्ध कर्म करना प्रत्येक व्यक्ति का परम कर्तव्य है।

उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों को उद्धृत करते हुए कहा कि जब हम अपने पूर्वजों के त्याग और बलिदान को स्मरण करते हैं, तभी भारत माता की सच्ची सेवा कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति में श्राद्ध की सनातन परंपरा है, जिसके माध्यम से हम अपने पितरों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

स्वामी रसिक महाराज ने कहा कि पूर्वजों के परलोक गमन के बाद भी कुछ दायित्व शेष रहते हैं। पूर्वजों की पूजा-अर्चना देवी-देवताओं की उपासना से पृथक नहीं है। पितरों की आत्माएं अपने परिजनों के आसपास विचरण करती हैं और धर्मपूर्वक मोक्ष की आकांक्षा रखती हैं। वे अपनी भावी पीढ़ियों में किसी भगीरथ की प्रतीक्षा करते हैं, जो उन्हें मृत्यु लोक से मुक्ति दिला सके। यदि मानव प्रमादवश अपने पितृऋण को भूल जाता है तो उसका पतन निश्चित है।

कथा के दौरान साध्वी मां देवेश्वरी, मंजू कोटनाला, सत्तेश्वरी मुंडेपी, अंजू ध्यानी, कैंट बोर्ड के उपाध्यक्ष व भाजपा नेता  भूपेन्द्र कण्डारी, पूर्व पार्षद भाजपा मसूरी  अनीता सक्सेना,  समाजसेवी विनोद राई ,रोज थपलियाल, सत्तेश्वरी कुकरेती, ऊषा कुंडलियां, बालव्यास दामोदर कृष्ण नौडियाल, आचार्य अजय कोठारी सहित बड़ी संख्या में सनातनी श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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